हिमालय में तबाही का अलर्ट
189 ग्लेशियर झीलें बनीं टाइम बम
- 3 करोड़ की आबादी पर मंडरा रहा मौत का साया
- प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा
- नेपाल से सिक्किम तक बांध और सड़कें तबाह
- हिमालय में ‘विकास की सोच’ बदलने की सख्त जरूरत
मंडला महावीर न्यूज 29. दुनिया की सबसे नई और अस्थिर पर्वत श्रृंखला ‘हिमालय’ इन दिनों जलवायु परिवर्तन और अवैज्ञानिक विकास की दोहरी मार झेल रही है। हिमालय क्षेत्र में लगातार आ रहे भूकंप, भूस्खलन और हिमनद (ग्लेशियर) पिघलने की घटनाएं अब एक-दूसरे से जुड़कर भयानक आपदाओं का रूप ले रही हैं। पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि हिमालय में विकास के मौजूदा मॉडल को नहीं बदला गया, तो पूरा दक्षिण एशिया एक अभूतपूर्व विनाश का सामना करेगा।
नेपाल-तिब्बत सीमा पर हालिया तबाही ने खोली पोल
26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर रसुवा क्षेत्र में ल्हेन्दे खोला नदी के ऊपरी हिस्से में एक भयानक घटना घटी। लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई से ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर 1,200 मीटर नीचे आ गिरा। इसके साथ आए बर्फ, चट्टान और मलबे ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में प्रलयंकारी बाढ़ ला दी। महज 30 मिनट में जलस्तर 9 मीटर तक बढ़ गया। इस सैलाब ने रास्ते में आने वाली 10 से अधिक पनबिजली परियोजनाओं, 50 किलोमीटर राजमार्ग और 30 पुलों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया। अमेरिकी संस्था यूएसजीएस ने भी इसे ग्लेशियर टूटने और मलबा प्रवाह की घटना बताया है।
सिक्किम का तीस्ता डैम: जब चेतावनियों को किया गया अनसुना
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर सिक्किम का हाल भी डराने वाला है। साल 2013 में ही राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने दक्षिण ल्होनक झील के फटने की 42% संभावना जता दी थी। इसके बावजूद झील के ठीक नीचे 1,200 मेगावाट की तीस्ता-3 जलविद्युत परियोजना का निर्माण किया गया। चेतावनी सच साबित हुई और 3-4 अक्टूबर 2023 की दरम्यानी रात यह झील फट गई। इस आपदा में 55 लोगों की जान गई, 74 लापता हुए और 7,000 से अधिक लोग बेघर हो गए। हैरानी की बात यह है कि आपदा के 14 महीने बाद उसी स्थान पर पहले से दोगुनी ऊंचाई (118.64 मीटर) के नए बांध को प्रारंभिक मंजूरी दे दी गई है, जो सीधे तौर पर नई आपदाओं को निमंत्रण देने जैसा है।
उत्तराखंड में 13 गुना बढ़ा निर्माण, 3 करोड़ लोगों पर सीधा खतरा
उत्तराखंड की तस्वीर पिछले तीन दशकों में तेजी से बदली है। 1992 से 2022 के बीच जहां बर्फ का दायरा और हरियाली घटी है, वहीं निर्माण कार्यों में 13 गुना की भारी वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में मौजूद 7,500 ग्लेशियर झीलों में से 189 झीलें किसी भी वक्त तबाही ला सकती हैं। इनमें से 56 ‘बेहद खतरनाक’ श्रेणी में हैं, जिनसे सीधे तौर पर लगभग तीन करोड़ की आबादी पर संकट मंडरा रहा है।
बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर तत्काल रोक की मांग
विशेषज्ञों का कहना है कि ऊंचे पहाड़ों में बर्फ चट्टानों के बीच प्राकृतिक ‘सीमेंट’ (पर्माफ्राॅस्ट) का काम करती है। तापमान बढ़ने से यह पिघल रही है और पहाड़ खोखले हो रहे हैं। ऐसे नाजुक क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा चौड़ी सड़कें, बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स और अनियोजित बस्तियों का निर्माण तबाही का कारण बन रहा है। विशेषज्ञों की मांग है कि जब तक हिमालय का व्यापक जलवायु आकलन पूरा नहीं हो जाता, तब तक बड़े जलविद्युत विकास प्रोजेक्ट्स पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।
सरकार के कदम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दरकार
भारत सरकार ने हालांकि इन खतरों से निपटने के लिए आधुनिक डॉप्लर वेदर रडार, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और झीलों की निगरानी के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है।
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा के अनुसार, “हिमालय हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है। भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान को आपदा पूर्व चेतावनी और रियल-टाइम डेटा साझा करने के लिए एक मंच पर आना होगा। प्रकृति को चुनौती देकर बनाया गया विकास अंततः मानव सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। समय रहते हिमालय में विकास की सोच बदलनी ही होगी, अन्यथा विनाश तय है।”
(रिपोर्ट आधारित: राज कुमार सिन्हा, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के लेख पर)









