महिलाओं ने गाय के गोबर से तैयार कीं 10 हजार इको फ्रैंडली वैदिक राखियां
भोपाल एयरपोर्ट से लेकर अन्य राज्यों तक वैदिक राखियों की मांग
- स्वदेशी स्वयं सहायता समूह की अनूठी पहल
- इस रक्षाबंधन अपनाएं जैविक वैदिक राखी
- आकर्षक गिफ्ट हैंपर भी उपलब्ध
मंडला महावीर न्यूज 29. इस रक्षाबंधन पर भाइयों की कलाई पर सजने वाला रक्षासूत्र पर्यावरण और स्वदेशी की महक से सराबोर होगा। जीआई टैग से सम्मानित 6 गांवों की 40 महिलाओं ने गाय के गोबर, प्राकृतिक रंगों और मोतियों से 10 हजार हस्तनिर्मित वैदिक राखियां तैयार की हैं। स्वदेशी स्वयं सहायता समूह की इस अनूठी पहल ने न सिर्फ विदेशी और प्लास्टिक राखियों का एक बेहतरीन जैविक विकल्प दिया है, बल्कि ग्रामीण अंचल की महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता के नए द्वार भी खोल दिए हैं। वहीं नाबार्ड और ग्रामीण विकास एवं महिला उत्थान संस्थान के सहयोग से बनीं ये इको फ्रेंडली राखियां न केवल पर्यावरण को सहेज रही हैं, बल्कि स्वदेशी की गूंज को भोपाल एयरपोर्ट से लेकर अन्य राज्यों तक पहुंचा रही हैं।
जानकारी अनुसार बाजार की चकाचौंध में इस बार रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति संरक्षण और ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण का भी गवाह बन रहा है। प्लास्टिक और चाइनीज राखियों को मात देते हुए आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला के इंद्री सेक्टर के 6 गांव इन्द्री, कामता, तिलई, सुरखी, सारा, चिचौली की 40 महिलाओं ने गाय के शुद्ध गोबर से 10 हजार वैदिक राखियां तैयार कर एक नई मिसाल पेश की है। बताया गया कि स्वदेशी स्वयं सहायता समूह ने इस वर्ष रक्षाबंधन पर पर्यावरण हितैषी पहल करते हुए महिला सदस्य गाय के शुद्ध गोबर से वैदिक राखी का निर्माण कर रही हैं। महिलाओं के इस समूह को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए मध्यप्रदेश शासन की ओर से जीआई टेग भी मिल चुका है।
परपंरिक और पर्यावरण अनुकूल है राखियां
इस वर्ष समूह का 10 हजार वैदिक राखियां बनाने का लक्ष्य था, जो सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुका है। ये राखियां पूरी तरह हाथ से बनाई गई हैं और प्लास्टिक मुक्त होने के साथ-साथ जैविक रूप से नष्ट होने वाली हैं। भारतीय परंपरा में गौमाता के विशेष महत्व को देखते हुए इसका नाम वैदिक राखी रखा गया है। इसके निर्माण में गोबर का पाउडर, प्रीमिक्स, प्राकृतिक रंग और सजावटी सामग्री जैसे मोती और ऊन का उपयोग किया गया है।
महिलाओं को मिल रहा रोजगार
इस पहल से ग्रामीण महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय का बेहतर अवसर मिल रहा है। समूह की महिलाएं राखी के अलावा हैंडमेड पेपर, साड़ी, दुपट्टा और गोंड आर्ट से जुड़े उत्पाद भी बनाती हैं, जिससे वे प्रतिमाह 10 से 15 हजार रूपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। समूह का उद्देश्य केवल राखी बेचना नहीं है, बल्कि स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना है। संस्था और समूह की महिलाओं ने आम जनता से अपील की है कि वे इस रक्षाबंधन पर स्वदेशी वैदिक राखी को अपनाएं और ग्रामीण महिलाओं के प्रयासों को अपना सार्थक समर्थन दें।
बाजार में राखियों और गिफ्ट हैंपर की मांग
ग्रामीण विकास महिला उत्थान संस्थान के डायरेक्टर रामकुमार सिंगौर ने बताया कि इन राखियों की कीमत 40 रुपये से लेकर 90 रुपये तक रखी गई है, जिसमें वुडन की-रिंग वाली राखियां भी शामिल हैं। त्यौहार को और आकर्षक बनाने के लिए विशेष गिफ्ट हैंपर भी तैयार किए गए हैं, जिनकी कीमत 300 से 500 रूपए के बीच है। इन हैंपर्स में राखी, रुमाल, कुमकुम, अक्षत, ड्राई फ्रूट्स और बिस्किट शामिल हैं। इन राखियों की मांग न केवल स्थानीय बाजार में है, बल्कि भोपाल एयरपोर्ट और अन्य राज्यों से भी इसके ऑर्डर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री के मंडला आगमन पर उनके लिए 20 विशेष गोंड चित्रकारी वाली राखियां भी तैयार की गई हैं।

इनका कहना है
हम वैदिक राखी बना रहे हैं जिसमें गाय के गोबर के पाउडर और प्राकृतिक प्रीमिक्स का उपयोग किया जाता है। हमारा 10 हजार राखियां बनाने का लक्ष्य पूर्ण हो चुका है, जिससे ग्रामीण महिलाओं को प्रतिमाह अच्छी आमदनी हो रही है।

हेमलता सिंगौर, अध्यक्ष, स्वदेशी स्वयं सहायता समूह
मैं दो साल से समूह से जुड़ी हूँ और प्रतिमाह 10-15 हजार रुपये कमा रही हूँ। हम पर्यावरण के अनुकूल वैदिक राखियां, कपड़े और गोंड आर्ट के उत्पाद बना रहे हैं, जिससे हमारी विलुप्त होती संस्कृति सुरक्षित हो रही है।

मुस्कान रघुवंशी, सदस्य, स्वदेशी स्वयं सहायता समूह
इस वर्ष हम गाय के शुद्ध गोबर और प्राकृतिक रंगों से इको फ्रेंडली वैदिक राखी तैयार की है। यह रक्षा सूत्र केवल एक धागा नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, हमारी भारतीय संस्कृति और ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता का एक मजबूत प्रतीक है।

रागनी अवधिया, सदस्य, स्वदेशी स्वयं सहायता समूह
नाबार्ड के सहयोग से महिलाओं को प्रशिक्षित कर स्वदेशी स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया है। हमारी राखियों की मांग भोपाल एयरपोर्ट से लेकर अन्य राज्यों तक है, जो महिलाओं के सतत विकास और जीविकोपार्जन में अत्यंत सहायक है।

राम कुमार सिंगौर, डायरेक्टर, ग्रामीण विकास महिला उत्थान संस्थान











