आधुनिकता की भेंट चढ़ीं सावन की परंपराएं

आधुनिकता की भेंट चढ़ीं सावन की परंपराएं

मंडला में अब न झूले नजर आते हैं, न सुनाई देते हैं सावन गीत

  • बदलते मौसम और बदलती जीवनशैली ने छीनी सावन की रौनक
  • सूनी पड़ी डालियां बयां कर रहीं गुजरे जमाने की बात
  • नही सुनाई दिए सावन के गीत
  • महिलाओं की व्यवस्तता से झूलों का क्रेज हुआ कम

मंडला महावीर न्यूज 29. आधुनिकता के तेज प्रवाह और शहरीकरण के बीच मंडला जिले का बहुरंगी लोकजीवन और पुरानी परंपराएं तेजी से बदल रही हैं। कभी सावन के महीने में ठंडी रिमझिम फुहारों और हरियाली के बीच पेड़ों पर पडऩे वाले झूले अब गुजरे जमाने की बात हो गए हैं। सावन का महीना समाप्ति की ओर है, लेकिन इस बार जिले में न तो सावन की वह झड़ी नजर आई और न ही पेड़ों की डालों पर झूले व युवतियों के सावन गीत सुनाई दिए।

अमूमन सावन का नाम आते ही झमाझम बारिश और दूर तक फैली हरियाली का अक्स उभरता है, लेकिन इस बार नजारा बिल्कुल अलग रहा। सावन में रिमझिम फुहारों की जगह लोगों को उमस और तेज धूप का सामना करना पड़ा। वहीं पूरे सावन माह में पांच-छ: दिन ही झमाझम बारिश हुई। वहीं बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में सावन के दौरान ऐसी गर्मी और उमस पहले कभी महसूस नहीं की। इस वर्ष का सावन अपने साथ कड़वी यादें छोड़ गया है, जहां बारिश की जगह लोगों को उमस और गर्मी महसूस करनी पड़ी।

सूनी रह गईं पेड़ों की डालियां 

हरे-भरे वनों, पहाड़ों और प्राकृतिक झरनों के लिए विख्यात मंडला जिले में पहले सावन आते ही बगीचों में झूले पड़ जाया करते थे। मायके आई युवतियां, महिलाएं और बच्चियां ढोल-मंजीरे की थाप पर सावन के गीत गाती थीं और एक-दूसरे से ऊंचा पेंग बढ़ाने की होड़ लगती थी। लेकिन शहरों के विकास के चलते पेड़ काट दिए गए और कुएं पाट दिए गए। अब न वे बगीचे बचे हैं और न ही सावन गीतों के स्वर दूर-दूर तक सुनाई देते हैं। हालांकि कुछ गिने-चुने स्थानों पर बच्चों ने झूला डालकर इस परंपरा का सांकेतिक निर्वहन जरूर किया, लेकिन पहले जैसा उत्साह और जोश पूरी तरह नदारद दिखा।

आखिर क्यों बेरंग हो गया सावन 

समाज के विभिन्न वर्गों से बात करने पर सावन की इन लुप्त होती परंपराओं के पीछे कई मुख्य कारण सामने आए हैं। जिसमें बताया गया कि विकास के चलते बगीचे और बड़े पेड़ खत्म हो गए हैं, जिससे झूले डालने की जगह ही नहीं बची है। पहले संयुक्त परिवारों में सभी मिलकर काम करते थे और फुरसत के पलों में त्योहार मनाते थे। अब एकल परिवारों में दिन भर के काम की थकान के बाद महिलाओं के पास इतना समय और ऊर्जा नहीं बचती कि वे झूलों और गीतों का आनंद ले सकें। महिलाओं और बच्चों को जो थोड़ा बहुत खाली समय मिलता भी है, वह अब टेलीविजन के पसंदीदा कार्यक्रमों या अन्य आधुनिक गैजेट्स में व्यतीत हो जाता है। स्कूलों में पढ़ाई का दबाव इतना बढ़ गया है कि बच्चों और किशोरों का ध्यान इन पारंपरिक गतिविधियों की ओर नहीं जा पाता। समय के साथ आई आधुनिकता की आंधी और लोगों की अत्यधिक व्यस्तता ने सावन के उत्साह को फीका कर दिया है। इसी के चलते अब सावन के त्योहार और रीति-रिवाज बहुत कम समय में, चंद लोगों द्वारा ही निभाए जा रहे हैं।

इनका कहना है

सावन में सभी जाति धर्म की शादीशुदा लड़कियां मायके जरूर आती थीं। सावन भर गांव या गांव के बाहर बागों में गीत गाते हुए झूला झूलती थीं और काफी समय से बिछुड़ी सहेलियां सावन में मिलकर एक दूसरे से अपने सुख दुख की बातें करती थीं। वक्त ने परंपराओं को इस कदर रौंद दिया कि सावन माह की पुरानी मान्यताएं भी विलुप्त हो रही है। काश वही दिन लौट आएं और वही मनभावन सावन के दिन देखने को मिलें।
श्रीमति संजना राय, गृहणी

सावन का महीना हिंदू में पर्वों का महीना माना जाता है। सावन में पूरे माह धार्मिक और सामाजिक पर्वों की धूम रहती है। लेकिन वक्त के साथ इन पर्वों में बदलाव आ गया है, पहले सावन में लोगों के घरों के साथ ही सार्वजनिक स्थलों, पेड़ों आदि में बड़े बड़े झूले बांधे जाते थे, जिनमें झूलते हुए बच्चे, महिलाएं सावन के गीत गाते थे लेकिन अब यह परंपरा समाप्त होती जा रही है। आधुनिकता की दौड़ में कमरे और आंगन इतने छोटे और सामानों से भरे पड़े हैं कि कमरों के अंदर या आंगन में झूले बांधना संभव ही नहीं हैं।
शिरोमणी सोनी, गृहणी

आधुनिकता के इस दौर में प्रकृति के संग झूला झूलना, सखियों के संग सावन के गीत गाना अब कहीं दिखाई नहीं देता। एक समय था जब सावन माह के आरंभ होते ही घर आंगन, बाग बगीचों में झूले लग जाते थे और महिलाएं कजरी गीतों के साथ उनका लुफ्त उठाती थी लेकिन आज आधुनिकता की चकाचौंध, बहुमंजिला इमारतों के विस्तार ने इन सब का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया है। यह परंपरा लुप्त सी हो गई है।
माधुरी कछवाहा, गृहणी

हमारे समय में सावन के महीने में जब बहन बेटियां मायके आती थी तब उनको बचपन का लाड़ प्यार आराम और खुशियां देने के लिए परिवारजन घरों में झूले सजाते थे कि उनकी लाड़ली अपने ससुराल की परंपराओं बंधनों से मुक्त कामकाज और व्यस्तता से स्वतंत्र मायके की खुशियों से आनंदित हो कर मल्हार और कजरी गा सके। लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में रिश्तों में तनाव और टूटते बिखरते परिवारों में चाह कर भी माता-पिता और भाई अपनी प्यारी बहन बेटियों को वैसा सुख नहीं दे सकते जो हमारी परम्पराओं में निहित है।
किरणलता बरमैया, गृहणी


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