मंडला के बड़झर में पारंपरिक ‘पटा बैठक’ के साथ मनी नागपंचमी
दिया ‘सांप किसान का रक्षक है’ का संदेश
- प्रकृति और सह-अस्तित्व का पर्व
- बड़झर में नाग देवता की आराधना
- ग्रामीणों ने लिया ‘मारो नहीं, बचाओ’ का संकल्प
मंडला महावीर न्यूज 29. मंडला जिले के बसनिया बांध डूब प्रभावित आदिवासी बाहुल्य ग्राम बड़झर में नागपंचमी का पर्व पूरी पारंपरिक आस्था, संस्कृति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर गांव में प्राचीन ‘पटा बैठक’ का आयोजन किया गया, जिसके माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सर्प भले ही जहरीला हो, लेकिन वह किसानों का सच्चा मित्र और प्रकृति का रक्षक है।
समाजसेवी पी.डी. खैरवार ने इस आयोजन की महत्ता बताते हुए कहा कि मंडला जैसा जंगल और कृषि प्रधान जिला जीवों के साथ ‘सह-अस्तित्व’ के भाव को भली-भांति समझता है। नागपंचमी हमें प्रकृति में हर जीव के महत्व को समझाती है।
ढोल-मंजीरों की गूंज और ‘पटा बैठक’ की अनूठी परंपरा
बड़झर के समाजसेवी हेमराज मसराम ने बताया कि हर साल की तरह इस बार भी सार्वजनिक रूप से ‘पटा बैठक’ आयोजित हुई। कार्यक्रम की शुरुआत पटेल मुक्कदम सरकार सुमरिन लाल परते जी के घर पर प्रकृति की अर्जी ‘जौहार सुमरनी’ के साथ हुई।
- होम-घी, राल और लोभान की आहुति तथा ग्रामवासियों के मधुर नागिन गीतों के बीच सुम्मत लाल परते के शरीर में शक्ति के रूप में नाग देव (जिन्हें बरुआ कहा जाता है) विराजमान हुए।
- दोपहर से देर शाम तक ढोल-मंजीरों की गूंज के बीच बरुआ का नागिन नृत्य चलता रहा, जिसे देखने आसपास के गांवों से भी भारी संख्या में लोग पहुंचे। गांव की सुख-समृद्धि के लिए यह आयोजन किया गया।
परंपराएं जो प्रकृति से जोड़ती हैं
बड़झर गांव में नागपंचमी की पूजा-विधि पूरी तरह से प्रकृति-प्रेम पर आधारित है:
- दूध और बांबी पूजन: ग्रामीण माहुल के पत्तों के दोने में कच्चा दूध रखकर उसे बमीठों (बांबी) और खेतों की मेड़ों पर चढ़ाते हैं।
जहर निकालने की प्रतीकात्मक प्रथा
पटे पर नागदेव की स्थापना होती है। जिस व्यक्ति पर नागदेव की सवारी आती है, वह कांसे की थाली में रखा दूध पीकर दूसरी थाली में रक्त जैसे रंग का ‘जहर’ निकालता है। मान्यता है कि इससे क्षेत्र में साल भर सर्पदंश का असर नहीं होता।
- तवे की रोटी का निषेध: नागदेव को कोई कष्ट न हो, इसके लिए इस दिन ग्रामीणों के घरों में तवे पर रोटी नहीं बनाई जाती।
- असली सांप को नहीं पकड़ते: यहां असली सांप को पकड़कर पूजा नहीं की जाती। घर की देहरी पर गोबर से नाग-नागिन बनाकर “दूर से सम्मान” का संदेश दिया जाता है।
पारिस्थितिकी संतुलन और ‘मारो नहीं, बचाओ’ का संदेश
यह पर्व सिर्फ धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी प्रतीक है। खेतों में चूहे फसल को नष्ट करते हैं और सांप उन्हें खाकर फसल बचाता है, इसलिए किसान उसे “खेत का रखवाला” मानते हैं। कान्हा-मण्डला के जंगलों में सांप खाद्य श्रृंखला की अहम कड़ी हैं। गोंड-बैगा आदिवासी समुदाय नाग को ‘धरती माता का गहना’ मानता है।
वन विभाग और स्वयंसेवी संगठन भी अब सर्प रेस्क्यू की ट्रेनिंग दे रहे हैं, ताकि सांपों को बस्तियों से पकड़कर जंगलों में सुरक्षित छोड़ा जा सके। नागपंचमी हमें भयमुक्त होकर ज़हरीले और निर्विष सांप में फर्क करना सिखाती है। ग्रामीण आज भी अपनी पुरखों की आस्था को मिलजुलकर निभा रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि ताकतवर होने का मतलब मारना नहीं, बल्कि रक्षा करना है।











