विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़े आदिवासी

विश्व आदिवासी दिवस विशेष

विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़े आदिवासी

  • जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर पूंजीवादी मॉडल ने किया हाशिए पर
  • केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का दिन हो विश्व आदिवासी दिवस
  • विस्थापन, कुपोषण और अधिकारों की अनदेखी से जूझता आदिवासी समाज
  • विकास के नाम पर आदिवासियों का सर्वाधिक विस्थापन
  • जल, जंगल और जमीन की लड़ाई अब भी जारी

मंडला महावीर न्यूज 29. अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस मूलनिवासियों के अधिकारों की रक्षा, उनकी अनूठी सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान के सम्मान के लिए समर्पित है। लेकिन आज भी आदिवासी समाज अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के संघर्ष में उलझा हुआ है। भारत की कुल आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी लगभग 8.6 प्रतिशत है, लेकिन विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वालों में इनका अनुपात 40 प्रतिशत तक है।

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा ने अपने लेख के माध्यम से स्पष्ट किया है कि विकास के पूंजीवादी मॉडल ने आदिवासी समाज को विकास का सहभागी बनाने के बजाय विस्थापन, गरीबी, कुपोषण और सांस्कृतिक विघटन का शिकार बनाया है।

विस्थापन का दंश और बुनियादी सुविधाओं का अभाव

खनन, बड़े बांध, औद्योगिक कॉरिडोर और वन संरक्षण के नाम पर सबसे ज्यादा विस्थापन का बोझ आदिवासी समुदायों ने उठाया है। मध्य प्रदेश (जहां राज्य की कुल आबादी का 21.1% आदिवासी हैं), छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में हालात बेहद चिंताजनक हैं। विस्थापन के कारण पैदा हुई प्रमुख चुनौतियां इस प्रकार हैं:

  • पारंपरिक रोजगार (इमारती लकड़ी, लघु वनोपज, औषधीय पौधे) का छिन जाना और शहरों में सस्ते मजदूर बनने की मजबूरी।
  • विस्थापित बच्चों का शिक्षा से वंचित होना और नई जगहों पर कुपोषण व संक्रामक बीमारियों का बढ़ता खतरा।
  • अपर्याप्त सरकारी मुआवजा, जिसके कारण विस्थापित परिवार पीढ़ियों तक गरीबी चक्र में फंसे रहते हैं।
  • रिपोर्टों के अनुसार, मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 58.58 प्रतिशत आदिवासी परिवार आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं।

पूंजीवादी विकास नीतियों पर उठे गंभीर सवाल

लेख में मौजूदा विकास नीतियों की कड़ी आलोचना की गई है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर आधारित विकास का लाभ प्रभावित समाज को नहीं, बल्कि बड़े घरानों को मिल रहा है। आदिवासियों को कथित ‘मुख्यधारा’ में जोड़ने के नाम पर उनकी अपनी जीवन-शैली, दर्शन, साहित्य और अर्थव्यवस्था की घोर अनदेखी की गई है। इसके अतिरिक्त, आदिवासी उपयोजना की राशि का गैर-आदिवासी क्षेत्रों में खर्च होना प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। नतीजतन, आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आज भी स्कूल, अस्पताल, सड़क और पेयजल का भारी अभाव है।

न्यायालय जाने की आर्थिक क्षमता न होने के कारण मध्य प्रदेश जैसे राज्य में सर्वाधिक निर्दोष आदिवासी जेलों में बंद हैं, और बच्चों में कुपोषण तथा मानव तस्करी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

राज कुमार सिन्हा
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

अंतरराष्ट्रीय संधियों और संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी

भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ के विकास के अधिकार (1986) और आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र (2007) के प्रावधानों का सही ढंग से पालन नहीं किया जा रहा है। इन संधियों के अनुसार प्रभावित व्यक्तियों की सहमति, लाभ में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी और आजीविका के संसाधनों पर अधिकार सुनिश्चित होना चाहिए।

विकास के लिए प्रमुख मांगें

  • वर्ष 1998-99 में स्वीकृत भूरिया समिति की अनुशंसाओं को पूरी तरह लागू किया जाए।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की पूर्व सहमति के बिना किसी भी तरह का भूमि अधिग्रहण या हस्तांतरण न हो।
  • संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वनाधिकार कानून का सख्ती से पालन हो।
  • देश और प्रदेश में विकास का मॉडल पूरी तरह ‘विस्थापन-विहीन’ और स्थानीय लोगों की भागीदारी पर आधारित हो।

उत्सव नहीं, जवाबदेही का दिन हो

राज कुमार सिन्हा के अनुसार, विश्व आदिवासी दिवस पर केवल आदिवासी नृत्य, वेशभूषा और संस्कृति का प्रदर्शन पर्याप्त नहीं है। भूमि अधिकार, पर्यावरणीय न्याय और संवैधानिक अधिकारों जैसे मूल प्रश्न सार्वजनिक विमर्श से गायब नहीं होने चाहिए। जब तक विकास की नीतियों में आदिवासी समुदायों की भागीदारी, सहमति और अधिकारों को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक विश्व आदिवासी दिवस का वास्तविक उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।


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