जर्जर स्कूल छोड़ झोपड़ी में पढऩे को मजबूर मासूम

शासन-प्रशासन को आईना दिखाती मवई से आई तस्वीर

जर्जर स्कूल छोड़ झोपड़ी में पढऩे को मजबूर मासूम

  • जर्जर भवन की छत गिरने के डर से ग्रामीणों ने बनाई घास-फूस की झोपड़ी
  • मासूमों की सुरक्षा से खिलवाड़, बीईओ कार्यालय को कई बार दी गई सूचना
  • हादसे के डर से ग्रामीणों ने उठाया कदम
  • बनाई झोपड़ी फिर भी नहीं जागे जिम्मेदार अधिकारी, क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार

मंडला महावीर न्यूज 29.  एक ओर जहाँ सरकार हर बच्चे को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित स्कूल भवन उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर मंडला जिले के मवई विकास खंड से सामने आई एक तस्वीर इन सभी सरकारी दावों की पोल खोल रही है।मामला ग्राम कोवडिया स्थित यूजीएस प्राथमिक शाला कोवडिया का है, जहाँ स्कूल भवन पूरी तरह से जर्जर हो चुका है और छत कभी भी भरभराकर गिर सकती है। अधिकारियों की अनदेखी के चलते अब मासूम बच्चे पक्के स्कूल भवन की बजाय घास-फूस की झोपड़ी में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।

⚠️ हादसे के डर से ग्रामीणों ने उठाया कदम, बनाई झोपड़ी

जर्जर भवन के चलते हर पल मंडराते खतरे को देखते हुए ग्रामीणों और अभिभावकों ने बच्चों की सुरक्षा के लिए अपने स्तर पर पहल की। उन्होंने स्कूल परिसर में ही एक घास-फूस की झोपड़ी तैयार की, जिसमें अब नियमित कक्षाएं संचालित की जा रही हैं।शिक्षकों और ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने जर्जर भवन की स्थिति को लेकर मवई बीईओ (विकासखंड शिक्षा अधिकारी) कार्यालय सहित संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार लिखित व मौखिक सूचना दी, लेकिन समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की गई। अंततः बच्चों की जान जोखिम में न डालते हुए ग्रामीणों को यह कदम उठाना पड़ा।

❓ करोड़ों के बजट के बीच आखिर कब मिलेगा सुरक्षित भवन?

स्कूल भवन के ठीक सामने बनी यह झोपड़ी शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है:

  • कागजी दावे बनाम जमीनी हकीकत: जब शिक्षा व्यवस्था के नाम पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया जाता है, तब आदिवासी अंचल के इन बच्चों को एक सुरक्षित पक्की छत के लिए तरसना पड़ रहा है।
  • प्रशासन की लापरवाही: जर्जर भवन किसी भी समय बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। सवाल यह उठता है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी किसी अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं?

📢 जिम्मेदार कब जागेंगे?

यह तस्वीर सिर्फ एक स्कूल की नहीं, बल्कि उन तमाम सरकारी दावों की सच्चाई है जो कागजों में तो चमकते हैं लेकिन धरातल पर दम तोड़ते नज़र आते हैं। जिस उम्र में बच्चों को सुरक्षित और आधुनिक माहौल में पढ़ाई करनी चाहिए, उस उम्र में वे झोपड़ी में बैठकर भविष्य गढ़ने को मजबूर हैं। अब देखना होगा कि इस खबर के बाद बेखबर बैठा प्रशासन हरकत में आता है या जिम्मेदार अधिकारी यूं ही आंखें मूंदे रहेंगे।


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