जिले की सबसे कीमती सब्जी पिहरी
बादलों की गडग़ड़ाहट के साथ जंगलों में उगती है पिहरी
- 1600 रुपये किलो तक बिकने वाली इस प्राकृतिक वनोपज के दीवाने हैं लोग
- मांस से भी ज्यादा पौष्टिक और लजीज है मंडला की पिहरी
- आदिवासियों के लिए बनी रोजगार और अच्छी आमदनी का जरिया
- मांस से कहीं ज्यादा पौष्टिक और फायदेमंद है पिहरी
- हल्की बारिश के बीच जंगलों में मिलती है पिहरी
मंडला महावीर न्यूज 29. भारत में आज कई किसान मशरूम की खेती कर अच्छी आमदनी कमा रहे हैं, लेकिन प्रकृति की गोद में कुछ ऐसी प्रजातियां भी अपने आप पनपती हैं जो किसी खेती की मोहताज नहीं। प्राकृतिक रूप से उगने वाली मशरूम की इन प्रजातियों में पिहरी का नाम शीर्ष पर आता है। गरज-चमक और हल्की बारिश के साथ जंगलों में उगने वाली यह पिहरी मंडला जिले और आसपास के ग्रामीण अंचलों में लोगों की सबसे पसंदीदा और कीमती सब्जी बनी हुई है।
जानकारी अनुसार पिहरी एक शत-प्रतिशत प्राकृतिक उपज है, जो मुख्य रूप से बारिश के मौसम में बांस के झुरमुटों और औषधीय पेड़-पौधों की जड़ों में सूखे पत्तों के बीच पनपती है। स्थानीय ग्रामीणों की मान्यता है कि आसमान में जितनी अधिक बिजली चमकती है और बादलों की गडग़ड़ाहट होती है, पिहरी की उपज उतनी ही ज्यादा होती है। बताया गया कि वनांचल और आदिवासी समुदाय के लोग इसे धरती का फूल भी कहते हैं। यह मध्य प्रदेश के मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, शहडोल और अनूपपुर के जंगलों में बहुतायत में पाई जाती है। बताया गया कि ग्रामीण अल सुबह ही जंगलों का रुख कर लेते हैं। भारी जोखिम और मेहनत के बाद वे उच्च गुणवत्ता वाली पिहरी खोजकर लाते हैं।
1600 रूपए तक बिकती है पिहरी
आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह वनोपज रोजगार और आर्थिक मदद का एक बहुत बड़ा जरिया है। बारिश के शुरुआती दौर में मंडला मुख्यालय के बाजारों में इसकी कीमत 400 से 600 रुपये प्रति किलो के बीच होती है। जैसे-जैसे मानसून रफ्तार पकड़ता है और मांग बढ़ती है, इसकी कीमत 1000 से 1600 रुपये प्रति किलो तक पहुँच जाती है। फिलहाल बारिश का सीजन धीरे-धीरे अपने अंतिम चरण जा रहा है, जिसके कारण पिहरी की कीमत करीब एक हजार रूपए प्रति किलो के आसपास चल रही है।
मुख्यालय के साथ हाईवे पर भी सजती है दुकानें
बारिश के सीजन में प्रतिवर्ष जिला मुख्यालय के नेहरू स्मारक के पास बारिश शुरू होते ही पिहरी की दुकानें सजने लगती हैं, जहां इसे खरीदने वालों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। इसके अलावा मंडला-जबलपुर और जबलपुर-बालाघाट राजमार्गों के किनारे भी ग्रामीण इसे बेचते हैं, जहां से व्यापारी इसे खरीदकर अन्य शहरों में ऊंचे दामों पर बेचते हैं।
सेहत के लिए संजीवनी, मांस से भी अधिक पौष्टिक
स्वाद प्रेमियों के बीच पिहरी बेहद लोकप्रिय है, लेकिन इसके औषधीय और स्वास्थ्य लाभ भी बेजोड़ हैं। पिहरी को वनस्पति मांस का बेहतरीन विकल्प माना जाता है। यह न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि यह मांस से कहीं अधिक पौष्टिक और सेहतमंद है। पिहरी में भारी मात्रा में आवश्यक प्रोटीन, खनिज और लवण पाए जाते हैं। इसके सूखे चूर्ण का उपयोग कई बीमारियों को दूर करने में भी कारगर साबित होता है।
शाकाहारियों के लिए वरदान
जिले में मिलने वाली पिहरी प्राकृतिक उपज है, जो बांस के पेड़ों की जड़ों में इन दिनों अपने आप पैदा हो जाती है। यह वनस्पति पिहरी मांस का सबसे अच्छा विकल्प है। यह ना केवल मांस से ज्यादा पौष्टिक और फायदेमंद है बल्कि उससे कहीं ज्यादा लजीज स्वाद भी देती है। जिन शाकाहारी लोगों को डॉक्टर प्रोटीन की कमी के चलते मांस खाने की सलाह देते हैं, उनके लिए पिहरी एक शानदार विकल्प है। इससे बिना जीव हिंसा किए शरीर को आवश्यक पोषण मिल जाता है।










