योजनाओं की भरमार के बीच कुपोषण से हार

योजनाओं की भरमार के बीच कुपोषण से हार

बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत ने खोली आदिवासी स्वास्थ्य नीतियों की पोल

  • बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत पर विवाद
  • सरकार का आंकड़ा 8, विपक्ष का दावा 19
  • स्वतंत्र चिकित्सकीय और सामाजिक ऑडिट की उठी मांग

मंडला महावीर न्यूज 29.  मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैगा बहुल इलाकों में अगस्त 2026 में हुई बच्चों की सिलसिलेवार मौतों ने राज्य की आदिवासी स्वास्थ्य और पोषण नीतियों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिरसा विकासखंड के कोण्डेकसा, बोंदारी, मछुल्दा, कोरका और आसपास के गांवों में बुखार, चकत्ते और किडनी से संबंधित गंभीर लक्षणों के बाद बच्चों ने दम तोड़ दिया।

मौतों के आंकड़ों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। जहां सरकारी तंत्र ने 8 बच्चों की मौत की पुष्टि की है, वहीं नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने 19 बच्चों की मौत का आरोप लगाया है।

बीमारी नहीं, गहरा कुपोषण है असली वजह

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि इन मौतों को केवल किसी संक्रामक बीमारी या अचानक फैली महामारी मानकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। इसका मूल कारण बैगा समुदाय में व्याप्त गंभीर कुपोषण और एनीमिया है, जो बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देता है, जिससे सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन जाते हैं।

बालाघाट के बैगा समुदाय पर हुए एक सामुदायिक अध्ययन के मुताबिक, स्कूल पूर्व बैगा बच्चों में दुर्बलता 42.3 प्रतिशत पाई गई थी। आहार में दाल, दूध, फल और हरी सब्जियों की भारी कमी के कारण बच्चे आवश्यक प्रोटीन और विटामिन से वंचित हैं।

कागजों पर दौड़ती योजनाएं, जमीन पर दम तोड़ते बच्चे

राज्य में विशेष पिछड़ी जनजातियों (पीवीटीजी) के लिए योजनाओं की कोई कमी नहीं है। वर्ष 2017 से संचालित ‘आहार अनुदान योजना’, आंगनवाड़ी, समेकित बाल विकास योजना (आईसीडीएस), और हाल ही में लागू ‘पीएम-जनमन’ जैसी बड़ी योजनाएं संचालित हैं। पीएम-जनमन का उद्देश्य ही बुनियादी सुविधाओं की कमी को दूर करना है। फिर भी स्वास्थ्य केंद्र मीलों दूर हैं, सुरक्षित पेयजल का अभाव है और पौष्टिक भोजन परिवारों की पहुंच से बाहर है। यह साबित करता है कि समस्या योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि डिलीवरी सिस्टम की विफलता है।

स्वतंत्र जांच और ‘समग्र मिशन’ की मांग

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा ने इस पूरी घटना को सरकारी तंत्र की नाकामी बताते हुए सरकार से तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने की मांग की है:

  • स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट: राजनीतिक दावों से परे, विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम द्वारा पिछले दो-तीन महीनों में हुई सभी बाल मृत्यु की स्वतंत्र जांच की जाए।
  • सामाजिक ऑडिट: पीएम-जनमन और आहार अनुदान सहित सभी योजनाओं का ग्राम स्तर पर सामाजिक ऑडिट हो, ताकि पता चले कि वास्तव में कितने परिवारों को लाभ मिल रहा है।
  • निगरानी प्रणाली: हर बैगा बस्ती में मासिक बाल स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली बनाई जाए, जिसमें सिर्फ वजन नहीं बल्कि हीमोग्लोबिन, संक्रमण और भोजन की विविधता का रिकॉर्ड हो।
  • एकीकृत मिशन: विभागों में बंटी योजनाओं के बजाय ‘बैगा परिवार समग्र स्वास्थ्य एवं पोषण मिशन’ बनाया जाए, ताकि एक ही छत के नीचे परिवार की हर बुनियादी जरूरत पूरी हो सके।

यह घटना इस बात की चेतावनी है कि आदिवासी विकास का असली पैमाना करोड़ों का बजट खर्च करना नहीं, बल्कि बैगा बस्तियों में बच्चों के स्वस्थ जीवन की गारंटी सुनिश्चित करना है।


राज कुमार सिन्हा

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ


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