चुटका परियोजना के विरोध में जबलपुर और भोपाल में डेरा डालो आंदोलन करेंगे आदिवासी, महा-बैठक में आर-पार की लड़ाई का ऐलान
जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए शंखनाद
- पेसा और वनाधिकार कानून की अनदेखी पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा
- परमाणु संयंत्र से लेकर अभयारण्य तक
- मंडला में आदिवासी अस्तित्व पर मंडराते खतरे के खिलाफ एकजुट हुए हजारों लोग
- ग्राम सभा की सहमति के बिना विकास मंजूर नहीं
- विधायकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भरी हुंकार
- चुटका परियोजना और विस्थापन के खिलाफ आदिवासियों का बड़ा ऐलान, जबलपुर-भोपाल में डालेंगे डेरा
मंडला महावीर न्यूज 29. मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों, किसानों और वन आश्रित समुदायों को उनकी खेती, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किए जाने का विरोध तेज हो गया है। जल, जंगल, जमीन और अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कल चुटका गांव में एक विशाल एक दिवसीय ‘महा-बैठक’ का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष को तेज करते हुए जबलपुर और भोपाल में ‘घेरा डालो, डेरा डालो’ आंदोलन चलाया जाएगा।
इन परियोजनाओं से अस्तित्व पर गहराया संकट
बैठक में मंडला जिले में प्रस्तावित चुटका परमाणु विद्युत परियोजना, बसनिया (ओढारी) बहुउद्देशीय बांध, अपर बुढ़नेर बांध, नारायणगंज एवं बीजाडांडी क्षेत्र में प्रस्तावित पम्प्ड स्टोरेज (हाइड्रो पावर) परियोजनाओं तथा राजा दलपत शाह अभयारण्य जैसी योजनाओं को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई। ग्रामीणों का कहना है कि ये परियोजनाएं हजारों आदिवासी परिवारों के अस्तित्व, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट पैदा कर रही हैं। इसके विपरीत, बीजाडांडी और नारायणगंज क्षेत्र के किसान पिछले एक दशक से बरगी बांध से लिफ्ट सिंचाई परियोजना लागू करने की मांग कर रहे हैं, जिसकी घोषणा 2023 में होने के बावजूद अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है।
जबलपुर की बलिदान भूमि से होगा शंखनाद
सम्मेलन में क्षेत्र के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मोले सिंह गोठरिया ने प्रस्ताव रखा कि अमर शहीद शंकरशाह और रघुनाथ शाह की बलिदान भूमि (जबलपुर) से इस संघर्ष का शंखनाद किया जाए। उन्होंने जबलपुर और भोपाल में बड़े स्तर पर ‘घेरा डालो-डेरा डालो’ कार्यक्रम चलाने का आह्वान किया, जिसका उपस्थित जनसमूह ने हाथ उठाकर पुरजोर समर्थन किया। राजीव गाँधी पंचायती राज संगठन जबलपुर के विवेक अवस्थी ने भी इस प्रस्तावित संघर्ष को अपना पूर्ण समर्थन दिया।

संवैधानिक अधिकारों और ग्राम सभा की अनदेखी का आरोप
सम्मेलन को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि संविधान की पांचवीं अनुसूची, पंचायत (पेसा कानून 1996) तथा वनाधिकार कानून 2006 आदिवासी समुदायों को जल, जंगल और जमीन पर पारंपरिक अधिकारों की गारंटी देते हैं।
ग्राम सभा की शक्ति:
पेसा कानून के तहत रूढ़ि ग्राम सभा को सर्वोच्च इकाई माना गया है। अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी विकास परियोजना, भूमि अधिग्रहण या पुनर्वास के लिए ग्राम सभा की स्वतंत्र और पूर्व सहमति अनिवार्य है।
विकास का मॉडल:
वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज विकास का विरोधी नहीं है, बल्कि वह ऐसे विकास का विरोध करता है जो उन्हें उनकी जमीन और संस्कृति से बेदखल कर दे। सरकार से मांग की गई कि विकास मॉडल स्थानीय समुदायों की सहमति, आजीविका और पर्यावरण संरक्षण पर आधारित होना चाहिए।
जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मिला साथ
इस महा-बैठक में भारी संख्या में आदिवासी, किसान, महिलाएं और युवा शामिल हुए। इसके अलावा नर्मदा पार सिवनी जिले से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
बैठक में क्षेत्रीय विधायक चेन सिंह बरकड़े, पूर्व विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले, जिला पंचायत सदस्य भूपेंद्र बरकड़े, पुष्पा मरकाम, मंडला जनपद पंचायत अध्यक्ष सोनू भलावी, उपाध्यक्ष विजेंद्र यादव, जनपद सदस्य राजेन्द्र पुट्टा, मदन सिंह बरकड़े, बजारी यादव, मुन्ना यादव, दुर्गेश लोधी, अजय मरकाम (कटनी), अतुल बंजारा, अनुराग सिंगौर, दादु लाल कुड़ापे, नोने सिंह, जानकी पटेल, रामलला, गहबर सिंह, गुलराज धुमकेती, मीरा बाई मरावी और सोना बाई समेत सैकड़ों लोगों की उपस्थिति रही। मंच का सफलतापूर्वक संचालन बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा ने किया।










