सेवा से हटाए गए अधिकारी को कैसे मिला वित्तीय प्रभार

सेवा से हटाए गए अधिकारी को कैसे मिला वित्तीय प्रभार

गबन और 12 साल गायब रहने के आरोपी को मलाईदार पद

  • कलेक्टर के आदेश को भी ठेंगे पर रख रहा सहायक आयुक्त कार्यालय
  • सेवा से बर्खास्त अधिकारी को कैसे मिला डीपीसी का प्रभार

मंडला महावीर न्यूज 29. जिले के जनजाति कार्य विभाग में एक बड़ा प्रशासनिक गोलमाल सामने आया है। वित्तीय अनियमितता, गबन और लंबे समय तक लापता रहने के गंभीर आरोपों से घिरे मवई विकासखंड के घुटास स्कूल में पदस्थ कुलदीप कटल वर्तमान प्रभार डीपीसी, पूर्व बीईओ बिछिया के मामले में सहायक आयुक्त कार्यालय मंडला द्वारा जिला कलेक्टर के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।बताया गया कि पूरा मामला झाबुआ में मध्यप्रदेश आदिवासी वित्त विकास एवं निगम में शाखा प्रबंधक के पद पर रहते हुए वर्ष 1995 से 1999 के बीच की गई वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है। जांच में दोषी पाए जाने के बाद आयुक्त आदिवासी विकास मप्र शासन ने 18 जून 2007 को स्पष्ट आदेश जारी कर कुलदीप कटल को दीर्घशास्ती के तहत शासकीय सेवा से हटा दिया था। सामान्य वित्तीय नियमों के अनुसार गबन के दोषी को दोबारा वित्तीय प्रभार नहीं दिया जा सकता। इसके बावजूद जिले के योग्य अधिकारियों की उपेक्षा कर एक दागी अधिकारी को प्राचार्य, बीईओ और डीपीसी जैसे महत्वपूर्ण वित्तीय पदों का प्रभार सौंप दिया गया, जो बड़ी साठगांठ की ओर इशारा करता है।

12 वर्षों की रहस्यमयी अनुपस्थिति पर पर्दा 

कुलदीप कटल का बड़वानी से मंडला स्थानांतरण वर्ष 2003 में हुआ था। उन्होंने 2008 में अपनी उपस्थिति दी और उसके बाद लगातार 12 वर्षों तक विभाग से गायब रहे। इसके बाद 5 सितंबर 2020 को अचानक उपस्थित होकर पदस्थापना का अभ्यावेदन दे दिया। इस मामले में अपर सचिव मप्र शासन आदिवासी विकास भोपाल ने 4 नवंबर 2020 को पत्र जारी कर 12 वर्षों की अनुपस्थिति पर की गई कार्रवाई का प्रतिवेदन जिला कलेक्टर के माध्यम से मांगा था, जिसे आज तक दबाकर रखा गया है। सूचना के अधिकार के तहत भी यह जानकारी छुपा ली गई।

कलेक्टर के अल्टीमेटम को भी किया नजरअंदाज 

इस गंभीर मामले की शिकायत जब जिला कलेक्टर से की गई, तो उन्होंने मामले को गंभीरता से लेते हुए 26 फरवरी 2026 को सहायक आयुक्त मंडला को पत्र जारी कर 3 दिनों के भीतर जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का कड़ा आदेश दिया था। इसके बाद 14 मई 2026 को जिला कलेक्टर कार्यालय से एक स्मरण पत्र भी जारी कर समस्त दस्तावेज मांगे गए। लेकिन सहायक आयुक्त कार्यालय ने कलेक्टर के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया। बताया गया कि सर्विस बुक और समस्त रिकॉर्ड कार्यालय में उपलब्ध होने के बावजूद जांच न करना और आरटीआई में व्यक्तिगत जानकारी का हवाला देकर जानकारी छुपाना, सहायक आयुक्त और आरोपी अधिकारी के बीच की कथित मिलीभगत को पूरी तरह उजागर करता है। जनता में अब यह सवाल उठ रहा है कि जिले में प्रशासनिक व्यवस्था बड़ी है या अधिकारियों का आपसी संरक्षण।


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