मुनाफे के मॉडल से आदिवासियों और प्रकृति पर मंडराया संकट

विश्व पर्यावरण दिवस

विकास की अंधी दौड़ में दम तोड़ती धरती

  • मुनाफे के मॉडल से आदिवासियों और प्रकृति पर मंडराया संकट
  • चिंताजनक आंकड़े: भारत में वायु प्रदूषण से 20 लाख मौतें
  • मप्र में पांच वर्षों में डायवर्ट हुई देश की 25 फीसदी वनभूमि

मंडला महावीर न्यूज 29.  5 जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ‘बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ’ के राज कुमार सिन्हा ने आधुनिक विकास के मौजूदा मॉडल और प्रकृति के बीच बिगड़ते संतुलन पर गहरा विशाद व्यक्त किया है। उन्होंने आगाह किया है कि जीवन के मूल आधार— हवा, पानी और मिट्टी आज गहरे संकट में हैं। यदि विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन नहीं रुका, तो करोड़ों लोगों को भीषण गर्मी, जल संकट, कुपोषण और विस्थापन जैसी विनाशकारी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

पूंजीवादी ताकतों का एजेंडा और स्वदेशी समुदायों का विस्थापन

लेखक के अनुसार, पर्यावरण केवल एक वैज्ञानिक या तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है। वर्तमान का विकेंद्रीकृत और कॉर्पोरेट-प्रधान विकास मॉडल केवल निजी मुनाफे से संचालित हो रहा है। इसके कारण जल, जंगल और जमीन पर निर्भर रहने वाले आदिवासी और स्थानीय समुदायों को अपनी जड़ों से विस्थापित होना पड़ रहा है। आदिवासियों का जीवन दर्शन हमेशा प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहा है। आज उनकी बदहाली के मूल में तथाकथित विकास की यही अंधी दौड़ है। उनके अस्तित्व का संकट वास्तव में पूरी दुनिया का संकट है।

प्राकृतिक खेती से थमेगा कार्बन उत्सर्जन

आलेख में बताया गया है कि आधुनिक कृषि पद्धतियां और कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग भूजल में जहर घोल रहा है, जो ‘ग्रीनहाउस गैसों’ का एक प्रमुख स्रोत भी बन गया है। इस संकट से निपटने के लिए ‘प्राकृतिक’ और ‘जैविक खेती’ ही एकमात्र विकल्प है। प्राकृतिक खेती अपनाकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और इससे कार्बन उत्सर्जन में 35% से 50% तक की कमी लाई जा सकती है।

अस्तित्व खोती आर्द्रभूमि (वेटलैंड) और महासागर

जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने में आर्द्रभूमि सबसे प्रभावी पारिस्थितिकी तंत्र है। परन्तु ‘वेटलैंड इंटरनेशनल’ के अनुसार, भारत की करीब 30 प्रतिशत आर्द्रभूमि पिछले तीन दशकों में विलुप्त हो चुकी है। इसी प्रकार, पृथ्वी की 50 से 85 प्रतिशत ऑक्सीजन पैदा करने वाले महासागर भी वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण खतरे में हैं, जिससे तटीय शहरों पर बाढ़ का संकट मंडरा रहा है।

मध्य प्रदेश में वनभूमि का बड़े पैमाने पर डायवर्जन

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) दिल्ली के डराने वाले आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि वर्ष 2015-16 से 2024-25 के दौरान भारत में 1.76 लाख हेक्टेयर वनभूमि गैर-वन कार्यों के लिए दे दी गई। चिंता की बात यह है कि इसमें से अकेले मध्य प्रदेश में 24,347 हेक्टेयर वनभूमि को डायवर्ट किया गया है, जो पिछले पांच वर्षों में पूरे देश में डायवर्ट की गई कुल वन भूमि का करीब 25 प्रतिशत है।

प्रदूषण और बढ़ती गर्मी का जानलेवा आंकड़ा

  • मौतों का तांडव: सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में वायु प्रदूषण के कारण 79 लाख लोगों की मृत्यु हुई है, जिनमें से अकेले भारत में 20.1 लाख मौतें दर्ज की गई हैं। पिछले एक दशक में भारत में पीएम 2.5 के कारण होने वाली मौतों में 61.08 प्रतिशत की भयानक वृद्धि हुई है।
  • बढ़ता तापमान: भारत का औसत तापमान पिछले एक दशक (2015-2024) में लगभग 0.9°C बढ़ गया है। वहीं पश्चिमी और पूर्वोत्तर भारत में सबसे गर्म दिन का तापमान 1950 के दशक से अब तक 1.5 से 2°C तक बढ़ चुका है।
  • प्लास्टिक का ‘भस्मासुर’: आधुनिक सुख-सुविधाओं की पूर्ति के लिए बनाया गया प्लास्टिक आज इंसानी अस्तित्व और प्रकृति के लिए सबसे बड़ा भस्मासुर बन चुका है।

निष्कर्ष: संरक्षण ही गरीबी उन्मूलन की शर्त

राज कुमार सिन्हा का मानना है कि भारत में प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह आजीविका और सामाजिक न्याय की समस्या है। गरीब और कमजोर समुदायों के लिए भूमि, जल और जंगल ही जीवन की बुनियादी नींव हैं। इसलिए, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण वास्तव में गरीबी उन्मूलन और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने की पहली शर्त है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही हमारे टिकाऊ भविष्य का एकमात्र रास्ता है।

राज कुमार सिन्हा
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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