एमपी में बिजली उपभोक्ताओं पर चौतरफा मार

23 साल में 2100 करोड़ का घाटा बढ़कर पहुंचा 50 हजार करोड़ के पार

एमपी में बिजली उपभोक्ताओं पर चौतरफा मार

  • महंगी बिजली और कुप्रबंधन का शिकार प्रदेश
  • निजी कंपनियों से ‘बिना बिजली लिए’ करोड़ों के भुगतान का आम जनता पर बोझ

मंडला महावीर न्यूज 29.  मध्य प्रदेश में बिजली क्षेत्र का कुप्रबंधन और निजी कंपनियों के साथ किए गए महंगे समझौते अब आम उपभोक्ताओं के लिए बड़ी मुसीबत बन गए हैं। ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ की सलाह पर साल 2003 में जिस ‘मध्यप्रदेश विद्युत मंडल’ का विभाजन घाटा कम करने के लिए किया गया था, उसका परिणाम आज विपरीत नजर आ रहा है। दो दशक पहले जो घाटा 2100 करोड़ रुपये था, वह अब बढ़कर करीब 50,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है।

मध्यप्रदेश में बिजली उत्पादन और खरीदी का काम तीन मुख्य स्तरों पर होता है – ‘मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी’ (जो बिजली खरीद की नोडल एजेंसी है), निजी बिजली कंपनियां और राज्य की सरकारी उत्पादन कंपनियां। ‘कैग’ की विभिन्न रिपोर्टों में ‘पावर मैनेजमेंट कंपनी’ की नीतियों पर सवाल उठाए गए हैं, जैसे महंगी दरों पर निजी कंपनियों से बिजली खरीद के अनुबंध। कुछ निजी पावर प्लांट्स से बिजली बाजार दर से अधिक कीमत पर खरीदी गई। अनुबंध के कई प्रावधानों के कारण राज्य को बिना बिजली लिए भी भुगतान करना पड़ता है।
कुछ अनुबंधों में ‘पास-थ्रू’ का प्रावधान है, जिससे बढ़ी हुई ईंधन लागत का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया गया। कैप्टिव प्राइवेट प्लांटों से भी बाजार कीमत से अधिक दरों पर बिजली खरीदी गई। जहां बाजार दर 2 से 3 रुपए प्रति यूनिट थी, वहीं 4.50 से 6 रुपए प्रति यूनिट तक भुगतान किया गया। राज्य की अपनी उत्पादन कंपनियों के पास पर्याप्त क्षमता होने के बावजूद निजी प्लांटों से अधिक बिजली खरीदी गई। ऊर्जा अर्थशास्त्रियों के अनुसार ये समझौते 2010 से 2015 के बीच हुए थे, जब कोयले की कीमतें अधिक थीं।

4.8% की नई बढ़ोतरी और उपभोक्ताओं का दर्द

1 अप्रैल 2026 से प्रदेश में बिजली की नई दरें लागू हो गई हैं, जिसमें 4.8 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। विद्युत नियामक आयोग ने वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के 6044 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे को आधार बनाकर इस वृद्धि को मंजूरी दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली कंपनियां ‘फ्यूल कास्ट एडजस्टमेंट’ (एफसीए) के नाम पर हर तीन महीने में दाम बढ़ाकर मध्यम वर्ग की कमर तोड़ रही हैं।

महंगे अनुबंध और ‘जीरो यूनिट’ पर करोड़ों का भुगतान

रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश सरकार ने कई निजी कंपनियों के साथ ऐसे समझौते किए हैं जिसमें बिना बिजली लिए भी भुगतान करना पड़ता है। वर्ष 2020 से 2022 के बीच सरकार ने निजी कंपनियों को 1,773 करोड़ रुपये का भुगतान किया, जबकि उनसे एक यूनिट बिजली भी नहीं खरीदी गई। हाल ही में जनवरी 2026 में 4,000 मेगावाट बिजली के लिए 5.83 रुपये प्रति यूनिट की दर से नया समझौता किया गया है, जिससे अगले 25 वर्षों में उपभोक्ताओं पर एक लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

पड़ोसी राज्यों की तुलना में एमपी में सबसे महंगी बिजली

आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में बिजली की दरें पड़ोसी राज्यों की तुलना में काफी अधिक हैं:

  • 200 यूनिट खपत पर: एमपी में बिल 1,425 रुपये, जबकि छत्तीसगढ़ में 900 और गुजरात में मात्र 785 रुपये है।
  • 300 यूनिट खपत पर: एमपी में 2,342 रुपये, जबकि छत्तीसगढ़ में 1,450 और गुजरात में 1,253 रुपये का बिल आता है।

विशेषज्ञों की राय

पूर्व अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेंद्र अग्रवाल और अखिल भारतीय पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के प्रवक्ता वीके गुप्ता का कहना है कि प्रदेश के पास पहले से ही आवश्यकता से अधिक बिजली (21,000 मेगावाट का करार) मौजूद है, फिर भी महंगे निजी समझौतों की कोई जरूरत नहीं थी। बरगी बांध विस्थापित संघ के राजकुमार सिन्हा के अनुसार, उत्पादन और वितरण में पारदर्शिता की कमी और जनपक्षीय नीतियों के अभाव के कारण प्रदेश का कृषि, उद्योग और घरेलू उपभोक्ता आर्थिक रूप से बेहाल है।


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