पर्यूषण पर्व का 28 अगस्त से होगा शुभारंभ, दशलक्षण धर्मों की होगी आराधना

पर्यूषण पर्व का 28 अगस्त से होगा शुभारंभ, दशलक्षण धर्मों की होगी आराधना

  • जैन समुदाय में दशलक्षण पर्व की धूम
  • क्षमा और आत्म-शुद्धि पर रहेगा जोर

मंडला महावीर न्यूज 29. जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व, पर्यूषण पर्व इस वर्ष 28 अगस्त से शुरू होने जा रहा है। इसे दशलक्षण पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इन दस दिनों में जैन समुदाय के लोग अपनी आत्मा के शुद्ध गुणों की आराधना, भक्ति और संयम का पालन करते हैं। यह पर्व आत्मा को सांसारिक विकारों से मुक्त कर स्वाभाविक गुणों को अपनाने का अवसर प्रदान करता है। पर्व के पहले दिन से ही दशलक्षण धर्मों का पालन शुरू हो जाता है। इसका आरंभ उत्तम क्षमा से होता है, जो आत्मा का स्वाभाविक गुण माना गया है। इसके बाद मार्दव (नम्रता), आर्जव (सरलता), शौच (पवित्रता), सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य (अपरिग्रह) और ब्रह्मचर्य जैसे दस धर्मों की आराधना की जाती है।

बताया गया कि पर्व के दौरान जैन धर्मावलंबी पूजा-पाठ, स्वाध्याय और ध्यान में लीन होकर अपने जीवन को सादगी और नैतिकता की ओर मोड़ते हैं। इन दस दिनों में व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म को शुद्ध करने का प्रयास करता है। दसलक्षण पर्व के समापन पर क्षमावाणी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन सभी लोग जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं और क्षमा करते हैं। यह पर्व आपसी भाईचारे, विनम्रता और समरसता की भावना को मजबूत करता है। महात्मा गांधी ने भी भगवान महावीर और राम के जीवन आदर्शों से प्रेरित होकर इन सिद्धांतों को अपनाया था, जो आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। यह पर्व न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि सभी लोगों के लिए आत्म-निरीक्षण और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश देता है।


विस्तार से

28 अगस्त से होने जा रहा है पयुर्षण पर्व का शुभारम्भ

पयुर्षण पर्व प्रारंभ होने वाले है इसे जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व भी कहते हैं। इन दिनों में आत्मा के विशुद्ध गुणों की आराधना की जाती है। अनादि काल से संसारी प्राणीयों में विभाव कर्मों का प्रभाव है जो आत्मा के स्वाभाविक गुणों को ढके हुए है। इन्हीं विभावभावों को दूर कर स्वाभाविक गुणों की आराधना, भक्ती पूजा, स्वाध्याय और संयम आदि रूप दिनचर्या बनाकर इन दिनों में की जाती है। जहां हिंदू संप्रदाय में श्री गणेश जी की स्थापना होती है वहीं जैन समुदाय में दिगंबर आमना में पयुर्षण पर्व का शुभारंभ हो जाता है।

दशलक्षण धर्मो में पहला धर्म उत्तम क्षमा का है। क्षमा आत्मा का स्वाभाविक धर्म है। दूसरा मार्दव धर्म है। मृदुता का भाव मार्दव है। मनुष्य के विचार और व्यवहार में जो सहज नम्रता कोमलता रहती है उसे ही संतों ने मार्दव धर्म कहा है। पयुर्षण का तीसरा दिन को आर्जव धर्म कहा गया है। हम सभी देखें कि सर्प बाहर कितना ही लहराकर क्यों ना चलता रहे किन्तु जब भी वह बिल में प्रवेश करना चाहेगा उसे सीधा सरल होना ही पड़ेगा। इसी तरह हमारा जीवन संसार में कितना ही टेड़ा मेड़ा क्यों न बना रहे, अपने आत्म-गृह में आने के लिये उसे एकदम सरल सीधा ऋजु होना ही पड़ेगा। इसी सरलता की परणति का नाम आर्जव धर्म है। ऋजुता का जो भाव है वह आर्जव है अर्थात् मन, वचन, काय की सरलता का नाम आर्जव धर्म है।
चौथे धर्म शौच धर्म कहा है। शौच धर्म पवित्रता का प्रतीक है। यह पवित्रता शुचिता संतोष के माध्यम से आती है। पाँचवा सत्य धर्म कहा है। कहा गया है कि सृष्टि का संचालन परमेश्वर करता है और यह भी कहा गया कि सत्य ही परमेश्वर है तो फिर क्यों न यह माना जाय कि सत्य रूप परमेश्वर से ही सृष्टि का संचालन होता है। सत्य प्रतिष्ठित है, सत्य परमेश्वर है। छठवाँ दिन को संयम धर्म कहा है। इसे बन्धन का दिन भी कह सकते हैं। पर यह बन्धन दुःखदाई नहीं अपितु दुःखों से छुटकारा पाने के लिए वन्दन अभिनन्दन रूप है।

पर्व का साँतवा दिन को दशलक्षणों में इसे तप धर्म कहा है। दो तरह के मार्ग हैं, जिसमें एक साधन सम्पन्न, सुख सुविधा का मार्ग है मार्ग एक स्वतंत्र स्वाधीन, साधना का मार्ग है। भारतीय संस्कृति ने धर्म-मार्ग के लिये साधन सम्पन्न नहीं किन्तु साधना सम्पन्न निरूपित किया है। यहाँ भोग को नहीं योग को, त्याग को सम्मान मिला है। पर्व का आँठवा दिन दशलक्षणों में इसे त्याग धर्म कहा है। त्याग हमारी आत्मा को स्वस्थ और सुन्दरतम बनाता है।

नववाँ दिन को दशलक्षणों में आकिंचन्य धर्म कहा है। यह खाली होने का धर्म है। रिक्त और हल्का होने का धर्म है। यह यात्रा जो हमें निज स्वरूप तक, मुक्तिधाम तक ले जाती है उसमें हल्का और खाली होना बहुत जरूरी है।अंतिम दसवाँ दिन दशलक्षणों में इसे ब्रह्मचर्य धर्म कहा है। आत्मा ही ब्रह्म है उस ब्रह्म स्वरूप आत्मा में चर्या करना, रमण करना सो ब्रह्मचर्य है। असल में हमारी ऊर्जा इन्द्रिय द्वारों से निरन्तर बाहर की ओर बह रही है जिससे हम क्षीण कमजोर हो रहे हैं।

ब्रह्मचर्य उस ऊर्जा को केन्द्रित कर आत्म-स्फूर्ति प्रदान करता है। पर्व के समापन के ‘क्षमावाणी’ का पावन पर्व मनाया जाता है। जहाँ विचार शुद्धि पर बल देता है तो वहीं वचन और व्यवहार में विनम्रता, मधुरता और समरसता लाने की भी प्रेरणा यह पर्व देता है। आत्मीयता, भाईचारे और विश्वबन्धुत्व की भावनाओं से ओतप्रोत होकर, जाने अनजाने में हुई वर्षभर की गल्तियों को स्वीकार कर क्षमा मांगना तथा क्षमा कर देना अपने भीगे विचार-परिमार्जन की कसौटी है।

भगवान महावीर और राम के जीवन आदर्शों से प्रेरित होकर महात्मा गांधी ने जिन सिद्धांतो को अपनाया उनसे हमें भी प्रेरणा लेनी चाहिए।

शोधार्थी

ब्र. साक्षी जैन, हिंदी विभाग
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर



 

Leave a Comment