32 हजार की आबादी को सहारा देने वाला स्वास्थ्य केंद्र खुद वेंटिलेटर पर

32 हजार की आबादी को सहारा देने वाला स्वास्थ्य केंद्र खुद वेंटिलेटर पर

  • बदहाली का शिकार नारायणगंज का बवलिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
  • जान जोखिम में डालकर हो रहे प्रसव
  • जर्जर भवन टपकती छत से प्रसुता महिलाएं परेशान

मंडला महावीर न्यूज 29. आदिवासी बाहुल्य जिले मंडला के नारायणगंज विकासखंड में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बवलिया इन दिनों बदहाली की जीती-जागती तस्वीर बना हुआ है। सन 1987-88 में बना यह भवन अब पूरी तरह से जर्जर हो चुका है, जिससे यहां इलाज कराने आने वाले 32 हजार की आबादी और स्वास्थ्यकर्मियों दोनों के लिए खतरा मंडरा रहा है। सबसे चिंताजनक स्थिति तो प्रसव कक्ष की है, जहां छत से लगातार पानी टपकने के बावजूद गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी के बाद प्रसव कक्ष में रूकना पड़ता है। यह सीधे तौर पर जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। जिस पर जिला प्रशासन का ध्यान नहीं है।

जानकारी अनुसार नारायणगंज विकासखंड के अंतर्गत आने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बबलिया में जीर्णशीर्ण भवन को रंगरोगन कर नया करने का प्रयास किया गया। लेकिन दीवार और छत की पर्याप्त मरम्मत नहीं की गई। जबकि बबलिया का यह स्वास्थ्य केन्द्र दो दर्जन से अधिक ग्राम पंचायत के लिए मायने रखता है। यहां समान्य उपचार के साथ गर्भवती महिलाएं भी पहुंचती है। लेकिन अव्यवस्थाओं के बीच उन्हें परेशान होना पड़ता है। पीएचसी बवलिया का भवन इतना पुराना और खराब हो चुका है कि इसकी छत से लगातार पानी रिसता रहता है, खासकर प्रसव कक्ष में तो हालात और भी बुरे हैं। यहां दीवारों पर सीलन और छत से टपकते पानी के बीच ही डिलीवरी कराई जाती है। मरीजों के बैठने के लिए कोई उचित जगह नहीं है, और पूरा भवन अस्त-व्यस्त स्थिति में है। दवाइयां रखने वाले कमरे की हालत भी खस्ता है, जिससे दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बताया गया कि प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र बबलिया में प्रति माह करीब 20 से 30 प्रसूति महिलओं का प्रसव होता है। जहां प्रसव के बाद उपचार के लिए महिलाओं को भर्ती रखा जाता है। बारिश के मौसम के बीच प्रसव के दौरान जान जोखिम में डाल कर महिलाएं, उनके परिजन व कर्मचारी समय गुजार रहे हैं। रात दिन उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत 52 गांव आते हैं, जिनकी कुल आबादी लगभग 32 हजार है। इतनी बड़ी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने वाले इस केंद्र की स्वास्थ्य विभाग द्वारा उपेक्षा समझ से परे है। रात के समय प्रसूता महिलाओं के साथ आए परिजनों को खुले आसमान के नीचे या टपकती छत के नीचे रात गुजारनी पड़ती है, क्योंकि उनके रुकने या खाना बनाने की कोई सुविधा नहीं है। उन्हें अपनी व्यवस्था खुद ही करनी पड़ती है, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।

कर्मचारियों और मरीजों दोनों की बढ़ी मुश्किलें 

भवन की जर्जर स्थिति के अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बवलिया में लैब टेक्नीशियन का पद भी लंबे समय से रिक्त पड़ा है। इस कारण यहां आने वाले मरीजों की आवश्यक जांचें नहीं हो पाती हैं। मरीजों को खून और अन्य जांचों के लिए या तो निवास जाना पड़ता है, या मंडला या फिर नारायणगंज की दौड़ लगानी पड़ती है, जिसमें न केवल समय और पैसा बर्बाद होता है, बल्कि इलाज में भी अनावश्यक देरी होती है। लैब टेक्नीशियन की नियुक्ति से स्थानीय लोगों और आसपास के गांवों के मरीजों को समय पर जांच की सुविधा मिल सकेगी और वे इस सरकारी अस्पताल का पूरा लाभ उठा पाएंगे।

जल्द कराया जाए नए भवन का निर्माण 

ग्रामीणों का कहना है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ध्यान दें। बवलिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के भवन का जीर्णोद्धार या नए भवन का निर्माण अतिशीघ्र कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही लैब टेक्नीशियन के रिक्त पद को भी तुरंत भरा जाना चाहिए जिससे 32 हजार की आबादी को उचित और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें और उन्हें अपनी जान जोखिम में डालकर या दूर-दराज के इलाकों में भटककर इलाज कराने को मजबूर न होना पड़े। जब तक इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता, तब तक यहां आने वाले मरीजों और उनके परिजनों की मुश्किलें कम नहीं होंगी, और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर उनका विश्वास भी डगमगाता रहेगा।

ग्रामीण महिलाओं का दर्द 

हम विगत दिवस डिलीवरी के लिए आए थे, जो हो गई है, लेकिन हमें सोने-बैठने में बहुत दिक्कत हुई। प्रसूता के साथ आए परिजनों को भी रात भर बाहर परेशान होना पड़ता है। यहां रुकने और खाना बनाने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। यह अस्पताल सिर्फ दिखाने के लिए है, शासन की योजनाएं इस भवन की वजह से हम तक ठीक से नहीं पहुंच पा रही हैं।
मुन्नी भारतीय, ग्राम धनगांव

हमने यहां आकर डिलीवरी कराई, लेकिन हमें बहुत परेशानी हुई। छत से पानी टपक रहा था और कहीं भी बैठने या सोने की जगह नहीं थी। परिजनों के रुकने की भी कोई सुविधा नहीं है। खाना बनाने की तो बिल्कुल भी व्यवस्था नहीं है। जिला प्रशासन को इस तरफ ध्यान देना चाहिए।
अंजू मरावी, ग्राम बनार



 

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