भक्तों के अभिषेक से पालन हार हुए बीमार
- प्रतिवर्ष 15 दिन के लिए बीमार होते भगवान जगन्नाथ
- दिया जा रहा औषधी युक्त काढ़ा
- बंद है भगवान के पट
- 27 जून को निकलेगी रथ यात्रा
मंडला महावीर न्यूज 29. प्रतिवर्ष भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा जिला मुख्यालय के रपटा घाट से निकाली जाती है, इसके पहले ही संसार के पालन हार भगवान जगन्नाथ जी स्वयं बीमार पड़ गए है। जिसके कारण 15 दिनों तक भगवान जगन्नाथ के पट बंद रहते है। इन 15 दिनों तक भगवान जगन्नाथ जी को औषधि युक्त काढ़ा के साथ नीम की गोली, परबल का जूस एवं अरबी उबालकर दिया जा रहा है। भगवान के बीमार होने का कारण विभिन्न प्रकार का जलाभिषेक है। जिसके कारण भगवान बीमार हो गए है। 15 दिन बाद भगवान की रथ यात्रा 27 जून को निकाली जाएगी।
जानकारी अनुसार भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का आयोजन जिला मंडला में छोटे रपटा घाट स्थित मंदिर से प्रतिवर्ष किया जाता है। इसी के अंतर्गत 27 जून को शहर में धूमधाम से भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा निकाली जाएगी। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से पहले जगत के पालन हार भगवान जगन्नाथ जी 15 दिनों तक एकांतवास में रहते है। भक्तों द्वारा ज्यादा अभिषेक के कारण भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार हो गए है। इस दौरान भोग पूजन में भगवान को औषधि युक्त काढ़े का भोग लगाया जा रहा है। एकांतवास के दौरान भक्त भगवान के दर्शन नहीं कर पा रहे है। बताया गया कि छोटे रपटा घाट स्थित भगवान जगन्नाथ के मंदिर में पूजन, अर्चन और विभिन्न तीर्थो के जल से प्रभु को स्नान कराया गया था। इसके बाद माँ नर्मदा के घाट तक भगवान जगन्नाथ प्रभु को ले जाया गया। जहां स्नान मंडप बनाकर स्नान कराया गया। इस दौरान भक्तों का हुजूम लगा रहा। बड़ी संख्या में लोग भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचे थे।
27 जून को दर्शन देंगे पालन हार
बताया गया कि प्रतिदिन भगवान को परंपरागत रूप से औषधि युक्त काढ़े का भोग लगाया जा रहा है। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़े वरदान आश्रम के संचालक नीलू महाराज ने बताया कि पुरी के भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की तरह ही शहर में विगत कई वर्षो से परंपरागत रूप से भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष भी 27 जून को भगवान जगन्नाथ जी को रथ पर सवार कर नगर भ्रमण कराया जाएगा और भक्तों को पालन हार दर्शन देंगे।
वदरान आश्रम में दी जा रही नीम की गोली
वरदान आश्रम संचालक नीलू महाराज ने बताया कि अंजनिया स्थित वरदान आश्रम में भी विगत दिवस भगवान जगन्नाथ जी महाप्रभु का ज्येष्ठाभिषेक जल स्नान कराया गया था। जिसके बाद महाप्रभु बीमार पड़ गये थे। जिसके कारण भगवान जगन्नाथ जी बीमार हो गए है। उनकी औषधियों से सेवा की जा रही है। इस अवधि में आरती, पूजा बंद है एवं जगन्नाथ भगवान को नीम की गोली, परबल का जूस एवं अरबी उबालकर दिया जा रहा है। नीलू महाराज ने बताया कि 15 दिन के बाद भगवान के स्वस्थ होने पर पालन हार को 56 भोग अर्पित किया जाएगा। इसके बाद रथयात्रा का आयोजन होगा।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए रूट तय
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी भगवान जगन्नाथ स्वामी की भव्य रथयात्रा का आयोजन 27 जून शुक्रवार को किया जाएगा। संध्या आरती मंच श्री सिद्धघाट रीवा दरबार मंडला द्वारा बताया गया कि 27 जून को दोपहर 12 बजे से आरंभ होने वाली रथयात्रा सिद्धघाट रीवा दरबार से निकाली जाएगी और शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरेगी। रथयात्रा सिद्धघाट दरबार से नेहरू स्मारक, स्टेट बैंक चौराहा, लालीपुर, बस स्टैंड, चिलमन चौक, पड़वा तक जाएगी, जहां से वापस पड़वा से चिलमन चौक, उदयचौक में लौटते हुए तहसील, सिटी कोतवाली, स्टेट बैंक चौराहा, नेहरू स्मारक से श्री सिद्धघाट रीवा दरबार में रथयात्रा का समापन किया जाएगा।
भगवान के बीमार होने के पीछे की भक्तिमय कथा
जब बीमार हुआ भगवान का भक्त
एक समय पुरी में माधवदास नामक एक परम भक्त रहते थे। वे प्रतिदिन भगवान जगन्नाथ की पूजा-आराधना करते थे। एक दिन उन्हें अतिसार का गंभीर रोग हो गया। इतनी कमजोरी हो गई कि चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया, फिर भी उन्होंने किसी से सहायता नहीं ली और यथाशक्ति स्वयं सेवा करते रहे।
प्रभु ने निभाई स्वयं सेवा
जब माधवदास बिल्कुल अशक्त हो गए, तब स्वयं भगवान जगन्नाथ एक सामान्य सेवक के रूप में उनके घर आए और उनकी सेवा करने लगे। जब माधवदास को होश आया, तो उन्होंने प्रभु को पहचान लिया। भावविभोर होकर उन्होंने पूछा “प्रभु! आप त्रिलोक के स्वामी होकर मेरी सेवा क्यों कर रहे हैं? यदि आप चाहते तो मेरा रोग ही समाप्त कर सकते थे। भगवान ने उत्तर दिया “भक्त की पीड़ा मुझसे देखी नहीं जाती, इसलिए स्वयं सेवा करने आया हूं। परंतु हर व्यक्ति को अपना प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है। तुम्हारे प्रारब्ध में जो 15 दिन का रोग शेष है, वह मैं अपने ऊपर ले रहा हूं।
हर साल होते हैं भगवान बीमार
इसी घटना के बाद से यह परंपरा बनी कि भगवान जगन्नाथ हर वर्ष स्नान पूर्णिमा के बाद बीमार हो जाते हैं और ‘अनवसर काल’ में विश्राम करते हैं। यही कारण है कि हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जब भगवान स्वस्थ होते हैं, तब अपने भक्तों के बीच भ्रमण के लिए रथ यात्रा पर निकलते हैं।












