अल नीनो का महा-संकट: 2026 के अंत तक भारत पर मंडराएगा सूखा और महंगाई का दोहरा खतरा
- मौसम ही नहीं, इंसानी गलतियां भी जिम्मेदार
- देश के 315 जिलों में मंडराया कृषि और जल संकट
मंडला महावीर न्यूज 29. ताजा वैश्विक पूर्वानुमानों ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। साल 2026 के आखिरी महीनों में एक अत्यधिक शक्तिशाली ‘अल नीनो’ (El Niño) के उभरने की पूरी आशंका है। प्रशांत महासागर से उठने वाली यह जलवायु घटना भारत के लिए केवल एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, जल संकट, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता पर चोट करने वाला एक बड़ा राष्ट्रीय खतरा बनकर सामने आ रही है।
वैज्ञानिकों ने भारत पर पड़ने वाले इसके संभावित दुष्प्रभावों को चार प्रमुख तिमाहियों में विभाजित किया है:
- जून से सितंबर 2026: मानसून पर संकट और बुवाई में देरी।
- अक्टूबर से दिसंबर 2026: खरीफ फसलों को भारी नुकसान और बढ़ती महंगाई।
- जनवरी से मार्च 2027: गर्म सर्दियां और रबी फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव।
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ा खतरा?
सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर की व्यापारिक पवनें (Trade Winds) गर्म जल को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं। लेकिन जब ये पवनें कमजोर पड़ती हैं, तो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यही स्थिति ‘अल नीनो’ कहलाती है।
वर्तमान में मानवजनित जलवायु परिवर्तन (Global Warming) के कारण अल नीनो की तीव्रता और अनिश्चितता दोनों रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। इसके चलते अब मानसून कमजोर होने के साथ-साथ कुछ ही दिनों में अत्यधिक बारिश होने और विनाशकारी बाढ़ आने का दोहरा जोखिम (ड्राई स्पेल और अचानक भारी बारिश) बढ़ गया है।
“हम खुद भी जिम्मेदार हैं” > पर्यावरण क्षेत्र में सक्रिय इशांत अग्रवाल (उत्तराखंड) का कहना है कि मानसून के इस तरह अचानक रूठ जाने का सारा दोष सिर्फ अल नीनो या ग्लोबल वॉर्मिंग पर नहीं मढ़ा जा सकता। बढ़ते शहरीकरण, वनों की अंधाधुंध कटाई, आर्द्रभूमियों (Wetlands) के विनाश और एकल फसल कृषि पद्धतियों ने हमारे स्थानीय जल चक्र को तबाह कर दिया है, जिससे भूमि की नमी लगातार घट रही है।
देश के 315 जिलों पर सीधा असर: मध्य प्रदेश के ये जिले सबसे संवेदनशील
देश की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित है। अनुमान के मुताबिक, देश के लगभग 315 जिलों में वर्षा सामान्य से काफी कम रहने की आशंका है, जहां सिंचाई के साधन बेहद सीमित हैं। प्रभावित होने वाले मुख्य राज्यों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य प्रदेश के निम्नलिखित जिले इस संकट की जद में सबसे पहले आ सकते हैं:
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धार, झाबुआ, बड़वानी, नीमच, रतलाम, दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, शिवपुरी, मंडला, सतना, बैतूल, छिंदवाड़ा और खंडवा।
बहुआयामी संकट: अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक ताने-बाने पर वार
अल नीनो का प्रभाव किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देशव्यापी होगा:
- कृषि और अर्थव्यवस्था: धान, गेहूं, दाल, गन्ना और तिलहन के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। कमजोर मानसून के कारण सरकार को पहले ही चीनी निर्यात रोकने जैसे कदम उठाने पड़े हैं। कृषि संकट का सीधा असर देश की जीडीपी (GDP) वृद्धि दर पर पड़ेगा।
- जल और ऊर्जा संकट: महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और बुंदेलाखंड जैसे इलाके पहले से ही भूजल दोहन से जूझ रहे हैं। कम बारिश से बांधों का जलस्तर घटेगा, जिससे बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति प्रभावित होगी।
- भीषण हीटवेव: वैज्ञानिकों के मुताबिक यह अल नीनो वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर ले जाएगा। इससे लंबी और तीव्र ‘हीटवेव’ (लू) चलेंगी। शहरी ‘हीट आइलैंड’ का असर बढ़ेगा, जिससे गरीब और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की कार्यक्षमता घटेगी और स्वास्थ्य पर गंभीर संकट आएगा।
- समुद्री जैव विविधता: तटीय राज्यों (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और केरल) में समुद्री तापमान बढ़ने से मछलियों की खाद्य श्रृंखला बाधित होगी, जिससे छोटे मछुआरों की आजीविका छिन जाएगी।
- सामाजिक असमानता: इसका सबसे क्रूर असर छोटे व सीमांत किसानों, भूमिहीन मजदूरों, महिलाओं और आदिवासियों पर पड़ेगा, जिससे ग्रामीण पलायन और सामाजिक असुरक्षा तेजी से बढ़ेगी।
सरकार की तैयारी और आगे की राह
इस संभावित महा-संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने 315 संवेदनशील जिलों को चिन्हित कर विशेष रणनीति तैयार की है:
- वैकल्पिक कृषि: कम बारिश की स्थिति में किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों और सूखा-रोधी बीजों की आपूर्ति की जा रही है। धान और मक्का जैसी खरीफ फसलों की सुरक्षा पर विशेष जोर है।
- राज्य स्तरीय निगरानी: बारिश, जल स्तर और खाद-बीज की आपूर्ति पर नजर रखने के लिए विशेष मॉनिटरिंग कमेटियां बनाई गई हैं।
विशेषज्ञों का सुझाव:
भारत को इस खतरे से पूरी तरह निपटने के लिए युद्ध स्तर पर बहुस्तरीय रणनीति अपनानी होगी। इसके तहत वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), भूजल पुनर्भरण, फसल विविधीकरण, प्राकृतिक व जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देना होगा। साथ ही, शहरों में हरित क्षेत्र (Green Cover) बढ़ाकर और सख्त ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू करके ही हम भविष्य में करोड़ों लोगों की आजीविका को सुरक्षित रख सकते हैं।
राज कुमार सिन्हा
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ











