बिलासपुर-मंडला -जबलपुर रेल लाइन
5 दशक पुराना ‘संसदीय सच’ आज भी रेल मंत्रालय की फाइलों में दफन
- आजादी के अमृतकाल में भी उपेक्षित महाकौशल
- 1979 में संसद में उठी मण्डला रेल मार्ग की मांग, आज भी अधूरा सपना
मंडला महावीर न्यूज 29. देश जहाँ एक तरफ आधुनिक रेलवे, वंदे भारत ट्रेनों और बुनियादी ढांचे के विकास के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, वहीं महाकौशल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी वनांचल की जमीनी हकीकत आज भी उपेक्षा की कहानी बयां कर रही है। मण्डला–बिलासपुर रेल मार्ग, जिसे आज की पीढ़ी केवल एक अधूरी परियोजना के रूप में जानती है, वह वास्तव में पिछले पांच दशकों से देश की संसद में धूल खा रहा एक महत्वपूर्ण विषय है।
हाल ही में स्वतंत्र रेल एक्टिविस्ट नितिन सोलंकी द्वारा सामने लाए गए 08 मार्च 1979 के लोकसभा रेल बजट चर्चा के आधिकारिक दस्तावेज इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस रेल लाइन की मांग आधी सदी पुरानी है।
जब संसद में गूंजा था मण्डला की उपेक्षा का दर्द
08 मार्च 1979 को रेल बजट पर सामान्य चर्चा के दौरान तत्कालीन सांसद स्व. श्याम लाल धुर्वे ने संसद में मण्डला जिले की उपेक्षा का मुद्दा मजबूती से उठाया था। लोकसभा की कार्यवाही में दर्ज उनके शब्द आज भी प्रासंगिक हैं:
“मण्डला आदिवासियों का क्षेत्र है, जहाँ उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर है। मण्डला से बिलासपुर के लिए रेलवे लाइन का सर्वे पहले ही हो चुका है, इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”
खनिज संपदा बाहर गई, लेकिन नहीं आई रेल
संसदीय बहस के दस्तावेजों से पता चलता है कि मण्डला क्षेत्र में बॉक्साइट सहित अनेक खनिज संपदाएँ और सफेद सीमेंट के लिए उपयुक्त पत्थर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। यदि समय रहते रेल संपर्क विकसित किया गया होता, तो क्षेत्र में बड़े औद्योगिक निवेश होते और हजारों युवाओं को रोजगार मिलता। लेकिन दुर्भाग्यवश खनिज बाहर चले गए, उद्योग अन्य क्षेत्रों में लग गए, और यह आदिवासी अंचल रेल सुविधा से वंचित ही रह गया।
फाइलों में दफन हुआ ‘रिव्यू सर्वे’
परियोजना के इतिहास पर नजर डालें तो:
- वर्ष 2003-04: दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे द्वारा PETS सर्वे कराया गया था।
- रेलवे बोर्ड का रुख: बाद में रेलवे बोर्ड ने नकारात्मक रेट ऑफ रिटर्न (ROR) और वित्तीय कारणों का हवाला देते हुए परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया।
- नियमों का उल्लंघन: रेलवे बोर्ड के निर्देशों के अनुसार हर 10 वर्ष में परियोजना का पुनरीक्षण (Review Survey) किया जाना था, किंतु वर्ष 2026 तक भी ऐसा नहीं किया जा सका है।
अब केवल 230 किलोमीटर का ‘Missing Link’ शेष
रेल एक्टिविस्टों और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों का दावा है कि वर्तमान परिस्थितियों में इस परियोजना की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है:
- जबलपुर से ग्वारीघाट तक ब्रॉडगेज रेल लाइन पहले से संचालित है।
- बिलासपुर की ओर से पंडरिया तक का हिस्सा विभिन्न स्वीकृत रेल परियोजनाओं के माध्यम से जुड़ने की दिशा में है।
- ऐसे में वास्तविक रूप से अब केवल लगभग 230 किलोमीटर का ही नया रेल खंड बनाना शेष रह जाता है।
“नर्मदा मैकलसुता–भोरमदेव रेल कॉरिडोर” की अनूठी अवधारणा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्तावित रेल मार्ग केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि एक बड़ा टूरिज्म हब बन सकता है। इसे “नर्मदा मैकलसुता–भोरमदेव रेल कॉरिडोर” के रूप में विकसित करने की मांग की जा रही है, क्योंकि यह मार्ग इन प्रमुख स्थलों को आपस में जोड़ेगा:
- जबलपुर का भेड़ाघाट, चौसठ योगिनी मंदिर और मदन महल।
- मण्डला की ऐतिहासिक विरासत, रामनगर किला और कान्हा राष्ट्रीय उद्यान।
- कबीरधाम का भोरमदेव मंदिर और बिलासपुर-रतनपुर का महामाया मंदिर।
जनता के अनुत्तरित सवाल
आज क्षेत्रीय जनता रेल मंत्रालय और रेलवे बोर्ड से सवाल पूछ रही है कि जब देश में हजारों करोड़ रुपये की नई रेल परियोजनाएँ स्वीकृत हो रही हैं, तो संसद में 50 वर्ष पहले गूंजी यह आवाज आज भी लंबित क्यों है? क्या महाकौशल के इस आदिवासी अंचल को कभी वह प्राथमिकता मिलेगी, जिसका वादा दशकों पहले किया गया था?









