निजी खर्च पर ट्यूबवेल लगाकर सूखते तालाब को बनाया बारहमासी

सकवाह कला के ग्रामीणों ने रचा जल इतिहास

निजी खर्च पर ट्यूबवेल लगाकर सूखते पंचायत तालाब को बनाया बारहमासी

  • नैनपुर के मछुआरों की आत्मनिर्भर बनी मिसाल
  • बिना सरकारी मदद के तालाब का गहरीकरण कर दूर किया गाँव का जल संकट

मंडला महावीर न्यूज 29. जहाँ एक ओर देश के कई हिस्से भीषण गर्मी और जल संकट से जूझ रहे हैं, वहीं मंडला जिले के विकासखंड नैनपुर का ग्राम सकवाह कला जल संरक्षण और सामुदायिक सहभागिता का एक अनोखा और प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरा है। गाँव की एक मछुआ सहकारी समिति की दूरदर्शिता, कड़ी मेहनत और सामूहिक संकल्प ने एक मौसमी तालाब को बारहमासी जलस्रोत में बदल दिया है, जिससे पूरे गाँव में खुशहाली आ गई है।

साधनों के अभाव में मार्च आते ही सूख जाता था तालाब 

सकवाह कला में स्थित 3.40 हेक्टेयर का पंचायत तालाब वर्षों से केवल मानसूनी बारिश पर निर्भर था। हर साल मार्च का महीना आते-आते यह पूरी तरह सूख जाता था, जिससे मत्स्य पालन, मवेशियों की प्यास और ग्रामीणों की दैनिक जरूरतें बुरी तरह प्रभावित होती थीं। इस गंभीर समस्या को वर्ष 2015 में गठित कबीर चौक मछुआ सहकारी समिति मर्यादित ने एक चुनौती के रूप में लिया। 45 सदस्यों वाली इस समिति ने पंचायत से तालाब को पट्टे पर लिया और संकल्प किया कि वे मछली पालन के साथ पानी भी बचाएंगे।

किसान क्रेडिट कार्ड से जुटाए पैसे, खुद खोदा 250 फीट गहरा ट्यूबवेल 

समिति के सदस्यों ने बैंक से मिले किसान क्रेडिट कार्ड ऋण और स्वयं के अंशदान को मिलाकर लगभग 1.40 लाख रुपये की पूंजी जुटाई। इस राशि से तालाब के किनारे 250 फीट गहरा ट्यूबवेल खुदवाया गया और 3 एचपी की मोटर स्थापित की गई। अब गर्मियों में जैसे ही तालाब का जलस्तर घटने लगता है, ट्यूबवेल चालू करके तालाब को पानी से भर दिया जाता है। इस छोटे से नवाचार से तालाब की जल भंडारण क्षमता में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, भूजल स्तर सुधरा है और मछुआरों की आय में भी 40 फीसदी का इजाफा हुआ है। समिति के अध्यक्ष नारायण झारिया गर्व से कहते हैं कि हमने अपने संसाधनों से ट्यूबवेल लगवाया, क्योंकि पानी रहेगा तभी मछली रहेगी और तभी गाँव आगे बढ़ेगा।

एक सफलता के बाद दूसरे तालाब का भी किया कायाकल्प 

इस बड़ी सफलता से उत्साहित होकर समिति ने जनवरी 2026 में गाँव के एक अन्य छोटे तालाब (0.21 हेक्टेयर) को भी पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। यह तालाब उथला होने के कारण सिर्फ चार महीने ही पानी रोक पाता था। समिति ने बिना किसी सरकारी आर्थिक सहायता के अपने कोष से 1.30 लाख रुपये खर्च कर इस तालाब का गहरीकरण कराया, जिससे इसकी जल धारण क्षमता कई गुना बढ़ गई। समिति के सचिव सरवन कुमार झारिया का कहना है कि सरकार से मदद की आस लगाने से पहले हमने खुद काम करके दिखाया। तालाब गहरा हुआ तो गाँव की सोच भी गहरी हो गई है। अब पानी के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि पानी बचाने के लिए एकजुटता है। सकवाह कला का यह आत्मनिर्भर मॉडल आज पूरे मंडला जिले के अन्य गाँवों के लिए एक बड़ी सीख और प्रेरणास्त्रोत बन गया है।


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