मन की बात पर टिकीं महाकौशल की नजरें
जबलपुर-मण्डला-बिलासपुर रेल कॉरिडोर पर क्या चुप्पी तोड़ेंगे पीएम मोदी
- नर्मदा मैकलसुता भोरमदेव रेल कॉरिडोर को बजट में शामिल करने की उठी मांग
- रेडियो साइलेंस के खिलाफ रेल एक्टिविस्टों के तेवर सख्त
मंडला महावीर न्यूज 29. महाकौशल के सबसे बड़े केंद्र जबलपुर सहित पूरे मध्य भारत को छत्तीसगढ़ से जोड़ने वाली बहुप्रतीक्षित रेल परियोजनाओं को लेकर क्षेत्र में सियासी और सामाजिक पारा पूरी तरह गरमा गया है। कल, यानी 31 मई 2026 (रविवार) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ का 134वां संस्करण प्रसारित होने जा रहा है। इस बार जबलपुर-महाकौशल के नागरिकों, रेल प्रेमियों और एक्टिविस्टों की नजरें पूरी तरह से प्रधानमंत्री के रुख पर टिकी हैं। क्षेत्र का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार जबलपुर और मण्डला के आदिवासी अंचलों को उनका वाजिब हक मिलेगा, या फिर उपेक्षा का पुराना दौर ही जारी रहेगा?
पिछले एपिसोड में महाकौशल के हाथ लगी थी भारी निराशा
गौरतलब है कि बीते 26 अप्रैल को आयोजित ‘मन की बात’ कार्यक्रम के लिए मण्डला के स्वतंत्र रेल एक्टिविस्ट (Independent Rail Activist) नितिन सोलंकी सहित महाकौशल के कई जागरूक नागरिकों ने ‘MyGov’ पोर्टल के माध्यम से बिलासपुर-मण्डला-जबलपुर रेल लिंक और नर्मदा-विंध्य रेल कॉरिडोर (पेंड्रा-अमरकंटक-मण्डला-गोटेगांव) को लेकर ठोस तकनीकी और आर्थिक डेटा के साथ सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को प्रस्ताव भेजे थे। जबलपुर को सीधे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से जोड़ने और मण्डला के जनजातीय इलाकों का भाग्य बदलने वाली इस परियोजना को लेकर क्षेत्रवासियों में भारी उम्मीदें थीं। लेकिन, जबलपुर और मण्डला से भारी संख्या में भेजे गए इन सुझावों के बावजूद पिछले एपिसोड में प्रधानमंत्री की ओर से इस बड़ी मांग पर पूरी तरह सन्नाटा पसरा रहा, जिससे महाकौशल के रेल प्रेमियों को तगड़ा झटका लगा था।
जबलपुर और मंडला की आर्थिक रफ्तार के लिए बेहद जरूरी है यह कॉरिडोर
रेलवे के जानकारों का साफ़ कहना है कि जबलपुर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि पूरे महाकौशल का व्यापारिक, चिकित्सा और प्रशासनिक दिल है। जब तक जबलपुर सीधे मण्डला होते हुए बिलासपुर और अमरकंटक रूट से नहीं जुड़ता, तब तक इस पूरे आदिवासी अंचल का औद्योगिक विकास अधूरा ही रहेगा। इस रूट के बन जाने से न केवल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच यात्रा की दूरी करीब 100 किलोमीटर कम होगी, बल्कि जबलपुर का व्यापार सीधे छत्तीसगढ़ के समृद्ध कोयला और औद्योगिक बेल्ट से जुड़ जाएगा, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
कल टूटेगी चुप्पी या फिर होगा ‘रेडियो साइलेंस’?
अब सबकी निगाहें कल 31 मई को सुबह 11 बजे प्रसारित होने वाले एपिसोड पर टिकी हैं। हालांकि, प्रशासनिक गलियारों में यह माना जाता है कि ‘मन की बात’ नीतिगत फैसलों या रेलवे बजट की बड़ी घोषणाओं का मंच नहीं है, लेकिन महाकौशल के एक्टिविस्टों का तेवर इस बार बिल्कुल साफ है। उनका कहना है कि जब तक देश के सर्वोच्च नेतृत्व के कानों तक जबलपुर-मण्डला की आवाज नहीं गूँजेगी, तब तक रेलवे पर दबाव नहीं बनेगा।
ठंडे बस्ते में नहीं जाएगी हक की लड़ाई: “नर्मदा मैकलसुता भोरमदेव रेल कॉरिडोर” नाम देने की मांग
रेल एक्टिविस्टों का कहना है कि MyGov पर दर्ज कराए गए ये प्रस्ताव अब आधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और रेल मंत्रालय के रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुके हैं। रेडियो पर प्रधानमंत्री कल बोलें या न बोलें, लेकिन जबलपुर और महाकौशल के इस हक की लड़ाई को अब ठंडे बस्ते में डालना रेल मंत्रालय के लिए आसान नहीं होगा। अब समय आ गया है कि इस पूरे रूट को “नर्मदा मैकलसुता भोरमदेव रेल कॉरिडोर” के रूप में विकसित करके आगामी रेल बजट में शामिल किया जाए।










