सशक्त पेसा कानून
तेंदूपत्ता प्रबंधन से आत्मनिर्भरता की ओर आदिवासी समाज
- बिचौलियों के खात्मे से सीधे खातों में पहुंच रहा लाभ
- ग्राम स्वराज्य की मिसाल
- बालाघाट से छिंदवाड़ा तक ग्राम सभाओं ने खुद संभाला तेंदूपत्ता का व्यापार
- मंडला में 20 प्रस्ताव निरस्त होने पर जांच की मांग
मंडला/बालाघाट महावीर न्यूज 29. आदिवासी समाज की आजीविका का मुख्य आधार हमेशा से जंगल, कृषि और लघु वनोपज रहा है। लंबे समय तक तेंदूपत्ता और महुआ जैसे कीमती वनोपजों पर ठेकेदारों और बिचौलियों का एकाधिकार रहा, जिससे आदिवासियों को उनका वास्तविक हक नहीं मिल पाता था। लेकिन अब ‘पेसा कानून 2022’ के प्रभावी क्रियान्वयन से मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक स्वशासन, आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्थिरता का एक नया युग शुरू हुआ है। कई ग्राम सभाओं ने अब तेंदूपत्ता के संग्रहण, भंडारण और बिक्री का निर्णय स्वयं लेकर आत्मनिर्भरता की एक रचनात्मक मिसाल पेश की है।
बालाघाट में 23 ग्राम सभाओं का ऐतिहासिक कदम
‘गांव गणराज्य महा ग्रामसभा’ बैहर (बालाघाट) द्वारा विगत कुछ वर्षों से तेंदूपत्ता संग्रहण एवं विपणन का कार्य सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इस वर्ष भी जनपद पंचायत बैहर के अंतर्गत आने वाली 12 पंचायतों की 23 ग्राम सभाओं ने संग्रहण और विपणन का स्व-प्रस्ताव पारित कर वन परिक्षेत्र कार्यालय को सौंपा है। जनपद के कार्यपालन अधिकारी ने मुख्य जिला कार्यपालन अधिकारी को सूचित किया है कि पेसा नियम 2022 की कंडिका 26(4) के प्रावधानों के तहत वर्ष 2026 में यह कार्य मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के सहयोग से सीधे ग्राम सभाओं के माध्यम से कराया जा रहा है। जिला पंचायत सदस्य मंशाराम मंडावी ने बताया कि बिरसा एवं परसवाड़ा क्षेत्र की अधिसूचित ग्राम सभाओं में इस वर्ष का तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य तेजी से प्रगति पर है।
मंडला में 20 प्रस्ताव निरस्त; निष्पक्ष जांच की मांग
दूसरी ओर, जिला मंडला में इस कानून को लागू करने को लेकर प्रशासनिक विसंगतियां भी सामने आई हैं। जनपद पंचायत मंडला के वन स्थाई समिति के सभापति हरेन्द्र मसराम ने बताया कि दिसंबर 2025 में पश्चिम एवं पूर्व सामान्य वन मंडल क्षेत्र की ग्राम सभाओं ने तेंदूपत्ता संग्रहण को लेकर कुल 32 प्रस्ताव प्रस्तुत किए थे। जनपद पंचायत द्वारा अनुमोदित किए जाने के बावजूद संबंधित विभाग ने इनमें से केवल 12 प्रस्तावों को स्वीकृति दी, जबकि 20 प्रस्तावों को बिना कोई ठोस कारण बताए खारिज कर दिया गया। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए अब कलेक्टर मंडला को एक लिखित शिकायत सौंपकर कार्रवाई की मांग की गई है।
“लघु वनोपजों, विशेषकर कीमती उपजों जैसे तेंदूपत्ता के व्यापार में वन निगमों या ठेकेदारों का एकाधिकार ‘वन अधिकार कानून’ की मूल भावना के विपरीत है। राज्य सरकारों को केवल सहयोगकर्ता की भूमिका निभानी चाहिए ताकि वन निवासियों को उनकी उपज का वास्तविक मूल्य मिल सके।”
— साधना राउत, तत्कालीन संयुक्त सचिव, आदिवासी कल्याण मंत्रालय, दिल्ली (12 जुलाई 2012 का निर्देश)
छिंदवाड़ा का ‘तामिया मॉडल’ बना पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा
छिंदवाड़ा जिले के तामिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत प्रतापगढ़ और चरगांव की 7 ग्राम सभाओं ने पेसा नियम के तहत सामूहिक रूप से काम कर एक सशक्त उदाहरण पेश किया है। शुरुआत में स्थानीय वन कर्मियों (बीट गार्ड) द्वारा ग्रामीणों को बोनस न मिलने और ठेकेदारों के डर का भ्रम फैलाकर गुमराह करने की कोशिश की गई, लेकिन जागरूक ग्रामीणों ने एकजुट होकर ग्राम सभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कराया।
इस अनूठी पहल के बेहद सकारात्मक वित्तीय परिणाम सामने आए:
- मजदूरी का भुगतान: 122 से अधिक ग्रामीणों को 1,20,000 रुपये की सीधे मजदूरी प्राप्त हुई।
- ग्राम सभा निधि: तेंदूपत्ता विक्रय के बाद 1,52,300 रुपये की शुद्ध राशि ग्राम सभा के खाते में सुरक्षित बची।
- बोनस का वितरण: ग्राम सभा ने सामूहिक निर्णय लेकर बची हुई राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा सीधे संग्रहकर्ताओं को बोनस के रूप में वितरित किया।
शेष बची हुई राशि को ग्राम सभा निधि में सुरक्षित रखा गया है, जिसका उपयोग पूरे गांव के विकास और सामूहिक कार्यों के लिए किया जाएगा।
लोकतांत्रिक स्वशासन का नया आयाम
तेंदूपत्ता संग्रहण एवं विपणन में ग्राम सभाओं की इस सीधी भागीदारी ने बिचौलियों की भूमिका को पूरी तरह सीमित कर दिया है। यह पहल केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में पारदर्शिता, सामुदायिक एकजुटता और आर्थिक सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है।
(रिपोर्ट: राज कुमार सिन्हा, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ)











