बैगा बाहुल्य अमवार गांव में दम तोड़ रहा जल जीवन मिशन

बैगा बाहुल्य अमवार गांव में दम तोड़ रहा जल जीवन मिशन

दावों की खुली पोल, बूंद-बूंद को तरस रहे आदिवासी

  • लाखों फूंकने के बाद भी नाले और झिरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण
  • प्रशासन के खिलाफ ग्रामीणों का फूटा आक्रोश

मंडला महावीर न्यूज 29. ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने के सरकारी दावे धरातल पर कितने खोखले हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण बैगा बाहुल्य ग्राम पंचायत अमवार में देखने को मिल रहा है। इस ग्राम पंचायत मुख्यालय को कभी बड़े ही जोर-शोर के साथ जल जीवन मिशन योजना की शुरुआत के लिए चुना गया था। प्रशासन ने दावा किया था कि अमवार देश और प्रदेश के लिए एक मिसाल बनेगा, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। योजना की शुरुआत से लेकर आज तक यहां के ग्रामीण पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। कागजों पर और बुनियादी ढांचे के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन ग्रामीणों के कंठ आज भी सूखे हैं।बताया गया कि ग्राम अमवार मुख्य रूप से विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा बाहुल्य ग्राम पंचायत है। सरकारें इन जनजातियों के उत्थान के लिए करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत करती हैं, लेकिन इस गांव की तस्वीरें व्यवस्था को आईना दिखा रही हैं। बुनियादी सुविधाओं से महरूम यहाँ के आदिवासी बैगा परिवार आज भी आदिम युग की तरह जीने को विवश हैं। पीने के साफ पानी की व्यवस्था न होने के कारण ग्रामीण कड़कड़ाती धूप और भीषण गर्मी में नदी-नालों के किनारे जाते हैं। वहां वे रेतीली जमीन को खोदकर झिरिया या छोटा गड्ढा बनाते हैं और घंटों इंतजार के बाद रिसकर जमा होने वाले मटमैले पानी को छानकर पीने और निस्तार के उपयोग में लाते हैं।

वार्ड क्रमांक 4 की स्थिति सबसे बदतर, 17 परिवार नाले के भरोसे 

गांव के भीतर पानी का संकट इस कदर गहरा चुका है कि मोहल्लों में हाहाकार मचा है। ग्रामीणों ने बताया कि वार्ड क्रमांक 4 की हालत सबसे ज्यादा दयनीय है। इस पूरे वार्ड में कहने को तो केवल दो हैंडपंप स्थापित किए गए हैं, लेकिन भूजल स्तर गिरने या तकनीकी खराबी के कारण दोनों हैंडपंपों ने पूरी तरह दम तोड़ दिया है। स्थिति यह है कि इन हैंडपंपों को दिनभर चलाने के बाद भी मुश्किल से 2 से 3 गुंडी पानी ही निकल पाता है। इतने कम पानी में पूरे मोहल्ले की प्यास बुझना नामुमकिन है। बताया गया कि इस वार्ड के लगभग 17 आदिवासी परिवार पूरी तरह से पास के एक नाले के गंदे पानी के सहारे अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं।

दूषित पानी से पहले भी हो चुकी हैं मौतें, फिर भी प्रशासन बेपरवाह 

ग्रामीणों ने दर्द बयां करते हुए बताया कि अभी तो गर्मी का मौसम है, जैसे-जैसे नाले सूख रहे हैं, परेशानी बढ़ रही है। लेकिन असली मुसीबत बारिश के दिनों में आती है। वर्षाकाल में नाले का पानी पूरी तरह गंदा और प्रदूषित हो जाता है, लेकिन प्यास बुझाने का कोई दूसरा विकल्प न होने के कारण मजबूरी में वही जहरीला पानी पीना मजबूरी बन जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि यह कोई पहली बार नहीं है जब हम इस संकट से जूझ रहे हैं। इससे पहले भी इसी नाले और झिरिया का दूषित पानी पीने के कारण हमारे बैगा परिवारों में कई लोग बीमार पड़े और कुछ की मौतें भी हो चुकी हैं। इसके बावजूद आज तक स्थानीय प्रशासन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग और सरकार द्वारा इस गंभीर समस्या पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

योजनाएं सिर्फ कागजों पर, धरातल पर शून्य 

इस अनदेखी से अब ग्राम अमवार के ग्रामवासियों का सब्र का बांध टूट चुका है और उनमें प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है। कुछ बैगा परिवारों ने तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि टीवी, अखबारों और बड़े-बड़े भाषणों में तो हमारे नाम पर न जाने कितनी योजनाएं संचालित होने की बातें कही जाती हैं। हमें विशेष संरक्षित जनजाति कहकर करोड़ों के फंड का ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन जब हम अपने गांव और मोहल्ले को देखते हैं, तो यहाँ किसी भी योजना का लाभ दिखाई नहीं देता। इसी छलावे के कारण समाज के लोगों में स्थानीय जनपद प्रशासन से लेकर जिला प्रशासन तक गहरी नाराजगी बनी हुई है।

ग्रामीणों ने की इस विकट संकट के निराकरण की मांग 

ग्रामीणों ने चेतावनी भरे लहजे में जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि उनकी समस्याओं को अब और नजरअंदाज न किया जाए। ग्राम अमवार के ग्रामीणों ने मांग की है कि अमवार के वार्ड क्रमांक 4 सहित पूरे गांव में तुरंत नए नलों का कनेक्शन सुचारू किया जाए। बंद पड़े जल जीवन मिशन के प्रोजेक्ट की उच्च स्तरीय जांच हो और उसे तत्काल चालू किया जाए। पानी की किल्लत को दूर करने के लिए नए जल स्रोतों का उत्खनन कार्य युद्धस्तर पर कराया जाए जिससे हर घर को शुद्ध पेयजल मिल सके।


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