विश्व पृथ्वी दिवस विशेष
संकट में पृथ्वी का अस्तित्व
- 9 में से 6 ‘ग्रहीय सीमाएं’ टूटीं, असंतुलित विकास बना विनाश का कारण
- प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और जैव-विविधता का खत्म होता आधार
- पारिस्थितिकी विनाश की कगार पर खड़ी है मानवता
मंडला महावीर न्यूज 29। 22 अप्रैल को मनाए जाने वाले ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ के अवसर पर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पृथ्वी की जीवन-सहायक प्रणालियां अब असुरक्षित स्तर तक क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। मानव-जनित प्रदूषण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण नौ में से छह ‘ग्रहीय सीमाएं’ (Planetary Boundaries) टूट चुकी हैं, जिससे जलवायु, जल और जैव-विविधता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है।
भारत की चिंताजनक स्थिति
‘वैश्विक प्रकृति संरक्षण सूचकांक 2024’ की रिपोर्ट ने भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। 180 देशों की सूची में भारत 176वें स्थान पर है। इस गिरावट का मुख्य कारण अकुशल भूमि-प्रबंधन और जैव-विविधता पर बढ़ते खतरे बताए गए हैं।
विलुप्ति की ओर बढ़ता जीवन
वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले 50 वर्षों में पृथ्वी के आधे से अधिक पक्षी, स्तनधारी और जलीय जीव लुप्त हो चुके हैं। वर्तमान में विलुप्ति की दर सामान्य से 100 से 1000 गुना अधिक है। ‘स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट 2025’ के मुताबिक, पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन पिछले 65 वर्षों में सबसे उच्चतम स्तर पर है, जिससे महासागर गर्म हो रहे हैं और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
मिट्टी और कृषि: संकट और समाधान
पारिस्थितिकी विज्ञान के अनुसार, समस्त जीवन का आधार मिट्टी है। वर्तमान में कृषि क्षेत्र ‘ग्रीनहाउस गैसों’ का प्रमुख स्रोत बन गया है।
समाधान: रासायनिक खाद के बजाय ‘प्राकृतिक खेती’ को अपनाना। इससे न केवल उत्सर्जन घटेगा, बल्कि मिट्टी की जल-धारण क्षमता भी बढ़ेगी।
आर्द्रभूमि (Wetlands): जिन्हें धरती की ‘किडनी’ कहा जाता है, वे आज शहरीकरण की भेंट चढ़ रही हैं। जबकि ये जंगलों से दोगुना कार्बन सोखने की क्षमता रखती हैं।
प्लास्टिक और अर्थव्यवस्था का बोझ
रिपोर्ट के अनुसार, 99% प्लास्टिक जीवाश्म ईंधन (तेल और गैस) से बनता है। प्लास्टिक का पूरा जीवनचक्र—उत्खनन से लेकर कचरा बनने तक—पर्यावरणीय अन्याय की कहानी कहता है। ऑस्ट्रेलिया के फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, मानव आबादी अब पृथ्वी की दीर्घकालिक वहन क्षमता (Carrying Capacity) को पार कर चुकी है।
गांधीवादी दर्शन और आदिवासी ज्ञान का महत्व
आज के संकटमय समय में महात्मा गांधी के विचार पुनः प्रासंगिक हो गए हैं। उनका मानना था कि प्रकृति हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है, लालच की नहीं।
सीख: ‘कम से कम लेना और ज्यादा से ज्यादा देना’ ही सतत विकास का मूल मंत्र है।
आदिवासी मॉडल: आदिवासी समुदायों की जीवनशैली, जो प्रकृति के चक्रों के साथ सामंजस्य बिठाकर चलती है, भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक है।
निष्कर्ष
बढ़ते पारिस्थितिकी विनाश को रोकने के लिए अब वैश्विक स्तर पर इसे ‘अंतर्राष्ट्रीय अपराध’ के रूप में परिभाषित करने की मांग उठ रही है। पृथ्वी को बचाने के लिए हमें अपने उपभोग के पैटर्न और विकास की दिशा को तत्काल बदलना होगा।
लेखक: राज कुमार सिन्हा (बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ









