जिला अस्पताल की दुकानों पर ‘नई नीति’ का साया

अस्पताल परिसर के व्यापारियों में आक्रोश

नई नीति के विरोध में उतरे 89 दुकानदार, आजीविका पर संकट का आरोप

  • कोर्ट के स्टे के बावजूद नोटिस का खेल
  • रोगी कल्याण समिति और व्यापारियों के बीच बढ़ा टकराव
  • भाजपा जिलाध्यक्ष ने दिया समर्थन

जिला अस्पताल की दुकानों पर ‘नई नीति’ का साया, भारी किराया वृद्धि के विरोध में लामबंद हुए व्यापारी

मंडला महावीर न्यूज 29. जिला अस्पताल परिसर में पिछले दो दशकों से व्यवसाय कर रहे दुकानदारों और जिला रोगी कल्याण समिति के बीच विवाद गहराता जा रहा है। वर्ष 2002 से संचालित 89 दुकानों पर वर्ष 2025 की नई नीति लागू किए जाने और किराए में भारी बढ़ोतरी के विरोध में व्यापारियों ने मोर्चा खोल दिया है। व्यापारियों का आरोप है कि समिति उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश (Stay Order) की अवहेलना कर रही है।

किराया वृद्धि ने बढ़ाई चिंता

व्यापारियों के अनुसार, वर्ष 2002 में नीलामी के माध्यम से ये दुकानें आवंटित की गई थीं। शुरुआत में न्यूनतम किराया 540 रुपये था, जो समय-समय पर बढ़कर वर्तमान में 1649 रुपये तक पहुँच चुका है। अब नई नीति के तहत छोटे दुकानदारों से 4 हजार और बड़े व्यवसायियों से 7 हजार रुपये मासिक किराया मांगा जा रहा है। व्यापारी दीपक तिवारी और राम क्षत्री ने बताया कि अनुबंध में 5 से 10 प्रतिशत वृद्धि का प्रावधान था, लेकिन अब मनमाने ढंग से किराया थोपा जा रहा है, जिससे छोटे दुकानदारों के सामने दुकान खाली करने की नौबत आ गई है।

न्यायालय की शरण में व्यापारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए कई व्यापारियों ने जबलपुर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। व्यापारियों का दावा है कि उनके पास कोर्ट का स्थगन आदेश है, इसके बावजूद समिति द्वारा नवीनीकरण और नीलामी के नोटिस जारी कर दबाव बनाया जा रहा है। प्रमोद पाठक सहित अन्य दुकानदारों का कहना है कि जब तक न्यायालयीन प्रक्रिया जारी है, तब तक नया अनुबंध थोपना वैधानिक रूप से गलत है।

सियासी समर्थन और आंदोलन की चेतावनी

व्यापारियों के इस संघर्ष को अब राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। भाजपा जिलाध्यक्ष प्रफुल्ल मिश्रा ने व्यापारियों के पक्ष में खड़े होते हुए प्रशासन से पुराने अनुबंध के तहत संरक्षण देने की मांग की है। वहीं, व्यापारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया और न्यायालय के आदेशों का सम्मान नहीं हुआ, तो वे उग्र लोकतांत्रिक आंदोलन और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर होंगे।


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