14 वर्षों में 425 लोगों ने दी नेत्रदान की सहमति, 13 साल में मिले 18 शवदान के आवेदन

विश्व अंग दान दिवस

14 वर्षों में 425 लोगों ने दी नेत्रदान की सहमति, 13 साल में मिले 18 शवदान के आवेदन

  • मरने के बाद भी जिंदा रहने का मौका, फिर भी लोग नहीं आ रहे आगे
  • अंगदान के प्रति जागरूकता की कमी 

मंडला महावीर न्यूज 29. मानवता की सेवा का जज्बा केवल अपने कर्तव्यों तक सीमित नहीं, बल्कि उससे कहीं आगे बढ़कर समाज को नई दिशा दे सकता है, इसका जीवंत उदाहरण जिले के 425 लोगों ने प्रस्तुत किया है। इन लोगों ने मरणोपरांत नेत्रदान करने का संकल्प लेकर न सिर्फ अपनी महानता का परिचय दिया है, बल्कि अन्य लोगों को भी इस पुनीत कार्य के लिए प्रेरित किया है। यह पहल आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला में नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगी।

मरने के बाद भी दूसरों को जिंदगी देने के नेक काम, अंगदान को लेकर मंडला जिले में जागरूकता की कमी साफ तौर पर दिख रही है। जिला चिकित्सालय मंडला के आंकड़ों से पता चलता है कि लोग अंगदान और शवदान के लिए आगे नहीं आ रहे हैं, जबकि यह एक ऐसा कार्य है जो मृत्यु के बाद भी जीवन को सार्थक बना सकता है।
जानकारी अनुसार वर्ष 2013 से 2025 तक पिछले 13 वर्षों में शवदान के लिए कुल 18 आवेदन पत्र प्राप्त हुए हैं। वहीं नेत्रदान के लिए वर्ष 2010 से 2024 तक 14 वर्षों में 425 लोगों ने अपनी सहमति दी है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जिले में अंगदान के लिए व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है। जागरूकता की कमी के कारण लोग अंगदान देने सामने नहीं आ रहे है। बताया गया कि इस वर्ष 2025 में अभी तक अंगदान या शवदान के लिए कोई नया आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है, जो चिंताजनक है। अंगदान, विशेषकर नेत्रदान किसी नेत्रहीन व्यक्ति के जीवन में रोशनी भर सकता है। इसी तरह शवदान मेडिकल छात्रों के लिए अध्ययन और शोध का एक अमूल्य साधन बनता है, जिससे चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।

सीएमएचओ डॉ. डीजे मोहंती ने बताया कि प्रतिवर्ष 25 अगस्त से 8 सितंबर तक नेत्रदान पखवाड़ा का आयोजन किया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को नेत्रदान के प्रति प्रेरित करना और इसकी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देना है। बावजूद इसके जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव कम ही नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि सामाजिक और धार्मिक भ्रांतियां, जानकारी का अभाव और अंगदान से जुड़ी प्रक्रिया की जटिलता भी हो सकती है।

जागरूक होने की जरूरत 

बताया गया कि अंगदान और शवदान जैसे कार्यों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर काम करने की जरूरत है। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाना, डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को इस विषय पर प्रशिक्षित करना और अंगदान के महत्व को समझाने वाले कार्यक्रमों का आयोजन करना आवश्यक है। तभी मंडला जिले में अंगदान की दर बढ़ सकती है और लोग मरने के बाद भी दूसरों के जीवन में उम्मीद की किरण जगा सकते हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति का निर्णय नहीं है, बल्कि एक पूरे समाज को जीवन देने का संकल्प है।

जैन समाज आया था आगे 

नेत्र दान के लिए वैसे व्यक्तिगत रूप से लोगों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। 2010 से 2024 तक 425 नेत्र दान काफी कम है। इसमें भी 108 नेत्र दाता जैन समाज के एक शिविर में आगे आए थे। सिंतबर 2017 में पिंडरई में शिविर लगाया गया था। जिसमें 108 लोगों ने नेत्रदान किया था। इस तरह समाजिक रूप से बड़ी संख्या में नेत्र दान के लिए लोगों को पेरित भी नहीं किया जा रहा है। लोगों के मन में आज भी भ्रांतियां जिसके कारण लोग अंग दान से पीछे हटते हैं।

हर कोई नहीं कर सकता अंगदान 

सिविल सर्जन डॉ विजय धुर्वे ने बताया कि हर कोई अंग दान नहीं कर सकता। कुछ मेडिकल कंडीशन वाले लोग कई बार अंग दान नहीं कर पाते। अंग दान करने का फैसला चिकित्सा मानदंडों के आधार पर किया जाता है। कुछ बीमारियां जैसे कैंसर, एचआईवी या किसी संक्रमण से पीडि़त लोगों से अंगों का दान नहीं लिया जाता है।

इनका कहना है

मैंने हमेशा से नेत्रदान के बारे में सोचा था कि मुझे अपने जीवन में यह नेक काम जरूर करना है। आज जब मुझे यह अवसर मिला है, तो मैं बहुत संतुष्ट महसूस कर रहा हूँ। मेरा मानना है कि मरने के बाद भी हमारी आँखें किसी के जीवन में रोशनी भर सकती हैं। यह एक ऐसा कार्य है जो हमें मृत्यु के बाद भी जीवित रखता है और किसी और की जिंदगी को रोशन करता है।


देवेन्द्र साहू, एसटीएस, मंडला

एक चिकित्सक के रूप में हमारा मुख्य उद्देश्य हमेशा से जीवन को बचाना और उसे बेहतर बनाना रहा है। नेत्रदान भी इसी उद्देश्य को पूरा करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह पहल न केवल चिकित्सा पेशे के मूल्यों को दर्शाती है, बल्कि समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाने में भी मदद करती है। किसी नेत्रहीन व्यक्ति के लिए यह दान किसी वरदान से कम नहीं होता, जो उसके जीवन में उजाला लाता है।


डॉ. सुरेंद्र सिंह, नारायणगंज



 

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