मवई में साल बीज की सरकारी खरीदी बंद, बिचौलियों की चांदी
- साल बीज का ग्रामीणों को नहीं मिल रहा उचित दाम
- साल बीज से मालामाल हो सकते है आदिवासी परिवार
मंडला महावीर न्यूज 29. आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले का पिछड़ा और वनांचल क्षेत्र मवई जिसे छोटा कश्मीर भी कहा जाता है, अपने घने साल के जंगलों के लिए प्रसिद्ध है। ये जंगल न केवल ठंडक और जड़ी-बूटियों के लिए जाने जाते हैं, बल्कि यहां के साल के वृक्षों से निकलने वाला बीज भी बेहद बहुउपयोगी है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से समर्थन मूल्य पर साल बीज की खरीद बंद होने से स्थानीय आदिवासी परिवारों को इसका उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिसका फायदा बिचौलिये उठा रहे हैं। बताया गया कि साल बीज खरीदी करने वाले बिचौलियों और दूसरे राज्य की कंपनियों के साथ जिले के अधिकारी, कर्मचारियों की मिली भगत के कारण मवई में साल बीज की खरीदी समर्थन मूल्य पर शुरू नहीं हो पा रही है। यहां के आदिवासी परिवारों को समर्थन मूल्य का लाभ नहीं मिल पा रहा है। क्षेत्र के कुछ बिचौलियों द्वारा ग्रामीणों से यह साल बीज मनमुताबिक दामों में खरीदकर जिले से बाहर बेच रहे है।
जानकारी अनुसार मवई में साल के जंगल बड़े पैमाने पर फैले हुए हैं। साल के वृक्ष की लकड़ी, बीज, फल, छाल और पत्ते सभी उपयोगी माने जाते हैं। साल बीज की बढ़ती मांग को देखते हुए पहले वन विभाग ने यहां वन समितियों के माध्यम से समर्थन मूल्य पर साल बीज की खरीद शुरू की थी। लेकिन विगत कुछ वर्षों से शासन द्वारा साल बीज का समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए राशि जारी नहीं की जा रही है। इस वजह से मवई क्षेत्र के ग्रामीणों को अपना साल बीज बिचौलियों को औने-पौने दामों में बेचना पड़ रहा है।
समर्थन मूल्य का अभाव, बिचौलियों की चांदी
बताया गा कि पिछले वर्षों में साल बीज का समर्थन मूल्य लगभग 20 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास था, जबकि खुले बाजार में इसके दाम 10 से 15 रुपये थे। समर्थन मूल्य पर खरीद बंद होने से वन समितियां अब खरीद नहीं कर रही हैं। वर्तमान में बिचौलिये आदिवासी परिवारों से करीब 15 से 16 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से साल बीज खरीद रहे हैं। यदि शासन वन समितियों को समर्थन मूल्य की राशि प्रदान करे तो न केवल वन समितियों को फायदा होगा, बल्कि आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर हो सकती है। समर्थन मूल्य पर खरीदी के साथ ग्रामीणों को इसका बोनस भी मिलेगा, जिससे उन्हें एक अच्छी आय अर्जित होगी और बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी।
मांग पत्र भेजा पर राशि नहीं आई
बताया गया कि विगत वर्ष मवई के वन परिक्षेत्र अधिकारी ने कहां था कि इस वर्ष भी प्राथमिक लघु वन उपज समिति द्वारा साल बीज के समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए मांग पत्र भेजा गया है, यह मांग पत्र जिला लघु वन उपज समिति और फिर राज्य लघु वन उपज संघ को भेजा गया, लेकिन समर्थन मूल्य में साल बीज खरीद के लिए कोई राशि जारी नहीं हुई है। इस कारण विगत वर्ष भी साल बीज की खरीद समर्थन मूल्य पर नहीं हो सकी। रेंजर ने वर्ष 2025 के लिए आश्वासन दिया था, लेकिन इस वर्ष भी बिचौलिये आदिवासी परिवारों से सस्ते दामों में साल बीज खरीदकर अपनी जेब भर रहे है।
उद्योग स्थापित होने से मिलेंगे रोजगार के अवसर
बताया गया है कि पिछले तीन-चार वर्षों से समर्थन मूल्य पर खरीद न होने के कारण मवई मुख्यालय में आदिवासी परिवार अपना साल बीज बिचौलियों को बेचने के लिए मजबूर हैं। एक सीजन में मवई क्षेत्र से एक करोड़ रुपये से अधिक का साल बीज खरीदा जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि साल बीज से जुड़े उद्योग मवई क्षेत्र में स्थापित हो जाएं तो हजारों आदिवासी युवाओं को रोजगार के साधन उपलब्ध हो सकते हैं, जिससे उन्हें काम की तलाश में बाहरी प्रदेशों में पलायन नहीं करना पड़ेगा।
मवई से गुजरात तक जाता है साल बीज
साल बीज का उपयोग कई महत्वपूर्ण उत्पादों में किया जाता है। साल बीज के तेल का उपयोग सामान्य तेल में मिलाने और वनस्पति घी बनाने में होता है। व्यापारियों के अनुसार साल के बीज का उपयोग चॉकलेट की ऊपरी परत बनाने और कपड़े धोने के साबुन बनाने में भी किया जाता है। मवई का यह साल बीज वनांचल क्षेत्र से लगे राज्य छत्तीसगढ़ के रायपुर और गुजरात की एक कंपनी द्वारा खरीदा जाता है, जिसे व्यापारी द्वारा खरीदकर रायपुर स्थित सरई मील भेजा जाता है।
साल बीज की खासियत
साल के वृक्षों की कई खासियतें हैं। हर साल मार्च, अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर में इनमें नए पत्ते लगते हैं, जबकि अन्य जगहों पर पतझड़ होता है। इन साल के पेड़ों की लंबाई 70 से 100 फीट तक होती है। इनकी लकड़ी पानी में खराब नहीं होती, इसलिए इसका उपयोग रेल की पटरियों में बिछाने में किया जाता है। इनकी जड़ों में पानी संग्रहण की क्षमता अत्यधिक होती है, बताया गया कि इनकी जड़ों में करीब पांच हजार लीटर तक पानी स्टोर रहता है। मध्य प्रदेश में साल के जंगल केवल मवई क्षेत्र, कान्हा के आसपास और डिंडोरी जिले के अमरकंटक के आसपास तक फैले हुए हैं। देश में यह जंगल पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में भी कुछ क्षेत्रफल में मिलते हैं।














