ईट भट्टे से शुरू हुआ संघर्ष का सफर, अब प्रदेश की है पीएचई मंत्री
- पंचायत से शुरू हुआ था राजनैतिक सफर, महिलाओं के लिए बनी प्ररेणा
- सरपंच से प्रदेश में कैबिनेट मंत्री बनने का सफर रहा प्रेरणादायक
- पीएचई कैबिनेट मंत्री बनने से पहले ईट भट्टे में कर चुकी दिहाड़ी मजदूरी
- तीन बार रह चुकी जिला पंचायत अध्यक्ष
मंडला महावीर न्यूज 29. भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपनी मेहनत, संघर्ष और ईमानदारी के बल पर उच्च स्थान प्राप्त करते हैं। मध्यप्रदेश की राजनीति में संपतिया उइके एक ऐसा ही नाम है, जो समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण के लिए लगातार काम कर रही हैं। उनका जीवन हर महिला, विशेष रूप से आदिवासी समुदाय की महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। एक साधारण आदिवासी परिवार में जन्म लेने के बाद मजदूरी करते हुए शिक्षा ग्रहण करने से लेकर तीन बार जिला पंचायत अध्यक्ष बनने और फिर राज्यसभा सांसद इसके बाद अब मुख्यमंत्री मोहन यादव की कैबिनेट में मंत्री बनने तक का उनका सफर प्रेरणा से भरा हुआ है। उनका संघर्ष यह दर्शाता है कि अगर संकल्प मजबूत हो तो कोई भी बाधा सफलता की राह में रोड़ा नहीं बन सकती।
सफलता एक रात की कहानी नहीं होती है, इसके लिए ईंट की तरफ आग भट्टे में तपना पड़ता है, इसके बाद ही व्यक्ति मंजिल तक पहुंच पाता है और सफलता मिलती है। ऐसे ही हमारे आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला की कैबिनेट मंत्री संपतिया उइके की कहानी है, जिसने दिहाड़ी में काम करने से लेकर मंत्री पद तक का सफर किया। इनके इस सफर में कई उतार चढ़ाव आए, लेकिन इन्होंने कभी भी हार नही मानी और आज प्रदेश की पीएचई मंत्री पर विराजमान है। इन्होंने इस मुकाम को हासिल करने से पहले अपने परिवार की मदद के लिए ईट भट्टे में मजदूरी की।
जानकारी अनुसार मध्यप्रदेश सरकार में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री और मंडला विधानसभा क्षेत्र से विधायक संपतिया उईके की कहानी वर्तमान की नारी सशक्तिकरण की जीवंत मिशाल है। मंडला के जनजातीय समाज से ताल्लुक रखने वाली मंत्री श्रीमति संपतिया उइके की कहानी राजनीतिक या सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है। एक सरपंच के रूप में कार्य कर चुकीं संपतिया भारत के उच्च सदन (राज्यसभा) में भी मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इसके अलावा वह तीन बार जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। संपतिया उइके का राजनीतिक सफर काफी संघर्षों भरा रहा। उन्होंने गरीबी को बहुत पास से महसूस किया है। राजनीति में आने से पहले वे ईट भट्टे में दिहाड़ी मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करती थी। यहीं से इनका संघर्ष शुरू हुआ।
माँ से मिली पढऩे की प्रेरणा
बताया गया कि आदिवासी कोटे से मंत्री बनी सम्पतिया उइके वर्ष 1999 में सरपंच बनने से पहले वे परिवार के पालन पोषण के लिए उन्हें ईंट भ_े पर मजदूरी तक करनी पड़ी। सरपंच के बाद वे जिला पंचायत सदस्य, जिला पंचायत अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद भी रहीं। इसके बाद मंडला विधायक और प्रदेश की पीएचई मंत्री बनी। संपतिया उइके ने बताया कि उनकी नानाजी प्राईमरी में शिक्षक थी, मां 8वीं तक पढ़ी थीं और वे चाहती थीं कि मैं उनसे ज्यादा पढ़ूं, इसलिए वो हमेशा मेरा हौसला बढ़ाती। गांव में प्राईमरी स्कूल के बाद सम्पतिया उइके ने आठवीं तक की पढ़ाई धुतका गांव से की। इसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। मंत्री संपतिया उइके ने बताया कि उनकी मां ने उन्हें पढऩे के लिए प्रेरित किया था। वैसे ही उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ाया है। उनका कहना है कि पढऩे की कोई उम्र नहीं होती। 2022 में श्रीमति संपतिया उइके ने स्वयं हिंदी में एमए की डिग्री हासिल की। उस समय वह राज्यसभा में सांसद थी।
आईएएस ओर नेता बनना चाहती थी श्रीमति संपतिया
उन्होंने बताया कि वह आईएएस या नेता बनना की प्रतिज्ञा ली थी। जिसके लिए वह अपनी मां की प्रेरणा से आगे पढ़ती गई। उन्होंने बम्हनी नगर से 12वीं की पढ़ाई की थी। 12वीं के बाद आगे की पढ़ाई उन्होंने मंडला में हॉस्टल में रहकर पूरी की। उन्होंने बताया कि उनका स्कूल उनके गांव से करीब 13 किमी दूर था। वह अपनी बहन के साथ साइकिल से स्कूल आती थी। स्कूल और उनके गांव के बीच नदी थी, जिसे पार करके स्कूल जाती थी। कभी कभी आने जाने में परेशानी का सामना भी करना पड़ता था, स्कूल से लौटते समय लेट भी हो जाते थे। पढ़ाई करने के दौरान ही उन्होंने इन परेशानी को देखते हुए आईएएस बनने या नेता बनने की प्रतिज्ञा ली कि नदी में पुल बनवाउंगी जिससे दूसरों को तकलीफ ना झेलना पड़े। वर्ष 2014 में ये मौका मिला, उस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयास से इस नदी पर पुल बना। उस समय श्रीमति संपतिया उइके जिला पंचायत अध्यक्ष थी।
ईट, भट्टे में किया काम
श्रीमति संपतिया उइके की शादी सन 1990 में टिकरवारा निवासी संजय उइके के साथ हुई। उसी समय संपतिया के पति का चयन पटवारी में हो चुका था, लेकिन पोस्टिंग नहीं हुई थी। उस दौरान भी उनके परिवार की स्थिति ठीक नहीं थी। परिवार चलाने के लिए श्रीमति संपतिया ने ईट भट्टे ओर खेतों में दिहाड़ी मजदूरी का काम भी करना पड़ा। ये उनके लिए बुरा दौर था, लेकिन यह दौर ज्यादा दिन नहीं चला। उनके पति की पोस्टिंग डिंडौरी जिले में हुई। इसके बाद भी उन्होंने मुझे आगे पढऩे के लिए प्रेरित किया और अपने सास, ससुर के साथ ही गांव में रहकर एक महिला मंडल बनाया और गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने एक स्कूल खोला ओर पढ़ाने लगी।
सरपंच से कैबिनेट मंत्री तक का सफर
उन्होने बताया कि 1999 में टिकरवाड़ा गांव की सरपंच निर्विरोध चुनी गईं। सरपंच चुनने के बाद उन्हे अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का मार्ग मिल गया। उनका कहना था कि भले ही मैं मायके में अपने गांव का विकास नहीं कर सकी, लेकिन मुझे ससुराल में ये मौका मिला। सरपंच का चुनाव लडऩे से पहले मैंने एक शर्त रखी कि मेरे सामने कोई दूसरा प्रत्याशी खड़ा न हो। गांव के सभी लोगों की मर्जी होगी, तभी मैं चुनाव लड़ूंगी। गांव के लोगों ने साथ दिया और 1999 में सामान्य सीट से निर्विरोध सरपंच चुन ली गई। इसके बाद वे तीन बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी। वर्ष 2013 में भाजपा ने उन्हें मंडला से विधानसभा चुनाव का टिकट दिया, लेकिन 1700 वोटो से हार हुई। इसके बाद 2017 तक सम्पतिया जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं। तीसरी बार उनका निर्वाचन निर्विरोध हुआ था। 2017 में भाजपा के दिग्गज अनिल माधव दवे के निधन से खाली हुई राज्यसभा सीट के लिए पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया और यहां भी वे निर्विरोध चुनी गईं। 10 वर्ष बाद 2023 में पार्टी ने उन्हें मंडला विधानसभा सीट से एक बार फिर प्रत्याशी बनाया। इस बार सम्पतिया उइके ने यह चुनाव 15 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज कर विधायक चुनी गईं और मध्यप्रदेश भाजपा सरकार में पीएचई विभाग में कैबिनेट मंत्री बन गई।












