जहां शिवजी की कृपा है, वहां बैर भाव हो ही नहीं सकता

जहां शिवजी की कृपा है, वहां बैर भाव हो ही नहीं सकता

  • नीमवाली माता मंदिर प्रांगण में श्री शिवपुराण का समापन

मंडला महावीर न्यूज 29. नीमवाली माता मंदिर प्रांगण हनुमानजी वार्ड में नीमवाली महिला मंडल समिति द्वारा नवदिवसीय श्री महापुराण का समापन कथा, हवन, पूजन, पूर्णाहूति, भंडारे के साथ समापन हुआ। समापन दिवस पर सुबह कथा का वाचन करते हुए आचार्य दिवाकर चौबे ने कहा कि शिव परिवार के चित्र को देखकर आप एक बात समझिए परिवार कितना प्रेम है। बैर भाव होते हुए भी सब लोग एक दूसरे के प्रेमी बने हुए हैं। शिवजी के परिवार में जितने भी हैं सब एक दूसरे से बैर रखते हैं। शिवजी का वाहन नंदी है, वहीं जगदंबा का वाहन सिंह है, सिंह गाय, बैल को देखकर खा जाता है। आज तक शिवजी के परिवार में ऐसा नहीं हुआ।

कथा में आगे बताया कि गणपति जी का वाहन मूसक है। शिवजी के गले में रहने वाला सर्प नागराज है। इनका भी बहुत बड़ा बैर है। लेकिन आज तक मूसक और नागराज का कोई युद्ध नहीं हुआ। गणेश जी वाहन मूसक है, ठीक वैसे ही कार्तिकेय जी का वाहन मोर है। शंकर जी के गले में रहने वाला सांप मोर का बहुत बड़े दुश्मन है। मोर सांप को मारके खा जाता है, लेकिन देखिए कितना प्रेम सभी में है। भगवान शिवजी के होने कारण बैर किसी के भीतर बढ़ा ही नहीं। जहां पर शिवजी है, जहां उनकी कृपा है वहां बैर भाव हो ही नहीं सकता। शिव महापुराण हमें यही सिखाती है।

काशी में हरीश्वर शिवलिंग के दर्शन जरूर करें 

कथा में आचार्य दिवाकर चौबे ने बताया कि आप जब कभी काशी जाएं तो हरीश्वर शिवलिंग के दर्शन करने जरूर जाएं। हरीश्वर का मतलब भगवान हरी के ईश्वर। उनके प्रादुर्भाव के बारे में बताया। विष्णु जी ने शंकर जी से सुदर्शन चक्र की प्राप्ति की थी। शिवजी ने विष्णु जी को उपहार में सुदर्शन चक्र दिया था। प्राचीन समय में राक्षस बहुत बलवान हो गए थे, उन्होंने देवताओं को बहुत कष्ट पहुंचाया, प्रताडि़त किया। देवतागण यत्र तत्र भागे और अंत में भगवान नारायण की शरण में गए। नारायण सब देवताओं के रक्षक थे। देवता भगवान नारायण के पास जाकर प्रणाम किए बोल प्रभू आप ही हमारी रक्षा की जिए। भगवान नारायण सक्षम नहीं थे कि युद्ध कर सकें। तब भगवान नारायण ने विचार किया कि कोई अस्त्र मेरे पास आ जाए जिससे मैं राक्षसों का वध कर सकूं। उन्होंने सोचा कि यदि मुझे राक्षसों को मारना है तो शंकर जी की आराधना कर उनसे ही कोई अस्त्र लेना होगा। तब वह शक्ति संपन्न अस्त्र हमारी सहायता कर सकेगा। भगवान श्री नारायण ने काशी की भूमि में अर्चन करना प्रारंभ किया।

शंकर जी को चढाया एक नेत्र 

शंकर जी को प्रसन्न करने वाला अर्चन करना प्रारंभ किया। भगवान शंकर जी को कमल प्रिय है। मनोकामना पूर्ण करने के लिए भगवान शंकर को कमल चढ़ाया जाए तो वह पूर्ण होती है। एक हजार की संख्या में कमल पुष्पों का अर्चन विष्णु जी कर रहे थे। गंगा तट में बैठकर पूजन किया और पूजन के दौरान एक हजार कमल पुष्प रखकर एक एक नम: करते हुए उन पुष्पों को चढ़ा दिए। 100, 200, 900 पुष्प् चढ़ा दिए। अंतिम बार पुष्प चढ़ाए तो उनकी संख्या 999 हो गई। एक पुष्प कम हो गया। मतलब सहस्त्र अर्चन नहीं हुआ। नारायण ने विचार किया कि कैसा करें, भगवान नारायण ने धर्मसंकट हो गया, भगवान नारायण का नाम है कमल नयन, भगवान के नेत्र कमल के पुष्पों के समान सुंदर नेत्र हैं, तो भगवान ने विचार करते हुए अपना दाहिना नेत्र निकाल लिया। ये सोचकर कि एक पुष्प कम है, तो मेरे नेत्र कमल की भांति है, तो कमल भांति पुष्प चढ़ा रहा हूं। जैसे ही शंकर जी को एक नेत्र चढाया, भूमि को विदीर्ण करते हुए भगवान भोलेनाथ प्रगट हो गए। प्रगट होकर भोलेनाथ ने विष्णु जी को नेत्र वापस दिया। तब विष्णु जी को भगवान भोले नाथ ने शत्रुओं के वध करने के लिए सुदर्शन चक्र भगवान नारायण को प्रदान किया। कथा समाप्ति के बाद हवन किया गया और फिर बड़ी संख्या में भक्तों ने प्रसादी पाई।



 

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