रामायण हमें जीने का सिखाती है तरीका 

  • रामायण हमें जीने का सिखाती है तरीका
  • नौ दिवसीय श्रीराम कथा का अंतिम दिवस उमड़ी भक्तो की भीड
  • आज होगा हवन के साथ विशाल भंडारा

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मंडला महावीर न्यूज 29.  ग्राम बिझोली में चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा का गुरुवार को समापन हुआ। कथा व्यास कनिष्ठ जगत गुरु स्वामी आत्मानंद सरस्वती महाराज ने अंतिम दिन की कथा में सुंदरकांड की कथा को समझाते हुए कहा। सुंदरकांड को इसलिए, सुंदरकांड कहा जाता है, कि उस कांड में जामवंत जैसे बुजुर्गों का सम्मान किया गया। जामवंत की बात सुनकर हनुमान जी लंका जाने को तैयार हुए। समाज में जब बुजुर्गों की बात मानी जाती है, तो वहां हर कार्य सुंदर होते हैं। यही सुंदरकांड का अभिप्राय है। आज जिस समाज में सयाने लोगों की बात नहीं मानी जाती। वहां लंका कांड होता है। जैसे रावण के राजमहल में राज्यसभा में सबसे सयाने माल्यवान जी महाराज थे। माल्यवान जिस समय रावण को समझाने गए,की सीता को वापस करने से ही तुम्हारा और लंका का कल्याण है। उस समय रावण ने ललकारते हुए माल्यवान को भगाया। कहा तुम हमें कायर समझते हो। मेरे भय से देवता भी भयभीत होते हैं। अर्थात जिस समाज में सयानो का सम्मान होता है, वहां सुंदरकांड का निर्माण होता है। जहां समाज में सयानो का अपमान होता है वहां लंका कांड अर्थात विनाश का पर्व हो जाता है।

इस प्रकार से सुंदरकांड में हनुमान ने प्रभु राम नाम की मुद्रिका को मुख में लिया। इसका आशय यह होता है कि मुख में श्री राम नाम की मुद्रिका को रखकर हनुमान जी समुद्र को लांघ गए और राम नाम के ही सहारे से लंका पहुंच गए। उधर से आने के लिए उन्हें सहारा चाहिए। भगवती किशोरी ने चूड़ामणि उतार करके दिया हनुमान जी उधर से चुणामणि के सहारे श्री राम जी के चरणों में आ गए। यहां से ब्रह्मा का सहारा वहां से शक्ति का सहारा। आज जिसके जीवन में ब्रह्म और शक्ति का सहारा हो जाए, वही इस संसार में और अमर होता है। वही संसार में सबसे बड़ा शक्तिशाली योद्धा होता है। हनुमान जी इसके प्रमाण है। लंका दहन, राम-रावण युद्ध, विभीषण का राज्याभिषेक सहित राजा राम के राज तिलक प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया।

श्री राम कथा के अंतिम दिन महाराज ने कहा रामायाण हमें जीना सिखाती है। कथा व्यास कनिष्ठ जगतगुरु शंकराचार्य आत्मानंद महराज ने कहा की रामायण हमें जीने के तरीके सिखाती है। कथा व्यास ने श्रीराम कथा का वर्णन करते हुए कहा गया कि दूसरों की सम्पत्ति चाहे कितनी भी मूल्यवान हो उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। चौदह वर्ष वनवास पूर्ण करने के बाद भगवान श्रीराम जब वापस अयोध्या पहुंचे तो अयोध्यावासी खुशियों से झूम उठे। रामायण हमें आदर, सेवा भाव, त्याग व बलिदान के साथ दूसरों की सम्पत्ति पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, ऐसा सिखाती है। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार भगवान श्रीराम ने दीन-दुखियों, वनवासियों आदिवासियों के कष्ट दूर करते हुए, उन्हें संगठित करने का कार्य किया एवं उस संगठित शक्ति के द्वारा ही समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर किया। हर राम भक्त का दायित्व है कि पुनीत कार्य में अपना सहयोग प्रदान करें। यह राम कार्य है। श्रीराम के राज्याभिषेक का वर्णन किया और बताया कि बुराई और असत्य ज्यादा समय तक नहीं चलता।

अन्तत: अच्छाई और सत्य की जय होती है। अधर्म पर धर्म की जीत हमेशा होती आई है। श्रीराम के राज्याभिषेक के प्रसंग के दौरान पूरे पंडाल में पुष्पों की वर्षा भक्तों द्वारा की गई। समापन अवसर निवास नगर के आस पास के गांव के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे। बताया गया की नो दिवसीय श्री राम कथा का समापन शुक्रवार को पूर्ण आहुति कन्या भोज विशाल भंडारे के साथ होगा आयोजक समिति ने पूरी तैयारिया कर ली हैं सभी श्रद्धालुओं से पहुंचने की अपील की हैं।


रिपोर्टर- रोहित प्रशांत चौकसे



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