पारिवारिक भोज: केवल भोजन नहीं, संस्कारों और स्वास्थ्य की संजीवनी है

पारिवारिक भोज: केवल भोजन नहीं, संस्कारों और स्वास्थ्य की संजीवनी है यह परंपरा

  • बदलती जीवनशैली और एकल परिवारों के बीच विलुप्त हो रही सामूहिक भोजन की संस्कृति
  • रंजीत कछवाहा ने की पुनर्स्थापना की अपील

मंडला महावीर न्यूज 29 | आधुनिकता की दौड़ में हम सुख-सुविधाएं तो जुटा रहे हैं, लेकिन उन परंपराओं को खोते जा रहे हैं जो हमारे परिवार और स्वास्थ्य की नींव थीं। ‘श्रीराम मंदिर ट्रस्ट’ व ‘सहकार भारती’ के जिलाध्यक्ष एवं ‘बाल कल्याण समिति’ के सदस्य रंजीत कछवाहा ने एक विशेष लेख के माध्यम से समाज का ध्यान ‘पारिवारिक भोज’ की विलुप्त होती परंपरा की ओर आकर्षित किया है। उन्होंने बताया कि कैसे एक साथ बैठकर भोजन करना केवल भूख मिटाना नहीं, बल्कि रिश्तों को सींचने का माध्यम है।

डिजिटल दूरी और एकल परिवार का संकट

लेख में कछवाहा जी ने वर्तमान स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हर हाथ में मोबाइल और हर कमरे में टीवी ने संवाद को खत्म कर दिया है। बच्चे वही सीख रहे हैं जो वे देख रहे हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवारों के बढ़ने से ‘सिंगल चाइल्ड’ संस्कृति पनप रही है, जहाँ माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि हमारे बच्चे हमारी बातों से ज्यादा हमारे आचरण से सीखते हैं।

बुजुर्गों के जीवन में छिपा है समस्याओं का समाधान

रंजीत कछवाहा के अनुसार, आज हम जिन मानसिक और शारीरिक समस्याओं के लिए विशेषज्ञों, काउंसलर्स या डॉक्टरों के चक्कर लगाते हैं, उनका समाधान हमारे पूर्वजों की दिनचर्या में पहले से मौजूद था। सात्विक जीवन शैली, ब्रह्ममुहूर्त में जागना और परिवार के साथ पारदर्शी जीवन जीना ही असल ‘लाइफ एन्जॉयमेंट’ है, न कि सोशल मीडिया के लाइक्स और कमेंट्स।

अध्यात्म और विज्ञान का संगम है ‘सामूहिक भोज’

लेख में स्पष्ट किया गया कि जमीन पर बैठकर भोजन करना, भोजन मंत्र का उच्चारण और पत्तलों का उपयोग करना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा विज्ञान छिपा है।

  • स्वास्थ्य लाभ: जमीन पर बैठकर भोजन करना पाचन के लिए बेहतर है।
  • सात्विकता: फास्ट फूड और डिस्पोजेबल संस्कृति ने शरीर के ‘वात, पित्त और कफ’ को असंतुलित कर दिया है।
  • औषधि के रूप में भोजन: उन्होंने डॉ. विश्वरूप राय चौधरी की ‘DIP डाइट’ और आयुर्वेद का हवाला देते हुए कहा कि हमारा भोजन ऐसा होना चाहिए कि वह स्वयं औषधि बन जाए।

पंच परिवर्तन और सामाजिक आग्रह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ के अंतर्गत भी इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि दुनिया भर में परिवार के सभी सदस्य कम से कम एक वक्त का भोजन साथ करें। रंजीत कछवाहा ने जिले के नागरिकों से आग्रह किया है कि वे अपनी जड़ों की ओर लौटें। प्रतिदिन परिवार के साथ भोजन और धार्मिक पूजन को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं ताकि परिवार एक ‘सुरक्षा ढाल’ के रूप में उभर सके।

रंजीत कछवाहा

(अध्यक्ष)
श्रीराम मंदिर ट्रस्ट कछवाहा समाज
सहकार भारती मंडला इकाई
एवं सदस्य- बाल कल्याण समिति CWC मंडला



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