पूर्वजों की विरासत सहेज रहा आदिवासी समाज

पूर्वजों की विरासत सहेज रहा आदिवासी समाज: कोलमगहन में पारंपरिक ‘सैला नृत्य’ की धूम

गहाई के बाद घर आए नए अनाज की पूजा और खुशहाली का पर्व, पारंपरिक वेशभूषा में झूमा पूरा गांव

मंडला महावीर न्यूज 29. आदिवासी अंचल के मवई ब्लॉक अंतर्गत ग्राम कोलमगहन में रविवार, 28 दिसंबर को अपनी गौरवशाली परंपराओं को सहेजने और नई पीढ़ी को हस्तांतरित करने के उद्देश्य से भव्य ‘सैला नृत्य’ का आयोजन किया गया। पंचायत भवन प्रांगण में आयोजित इस कार्यक्रम में आदिवासी समाज की मातृशक्ति, पितृशक्ति और युवाओं ने अपनी पारंपरिक रीति-नीति और नेग-दस्तूर के साथ शिरकत की।

परंपरा और ज्ञान का संगम: क्या है ‘सैला’ का अर्थ

कार्यक्रम के दौरान समाज के वरिष्ठों ने पारंपरिक ज्ञान साझा करते हुए बताया कि ‘सैला’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘शै’ यानी खरीफ की फसल की गहाई के बाद कमाई का आकलन, और ‘ला’ यानी खलिहान से अनाज को घर लाना। नए धान के घर आने की खुशी में प्रकृति और पेन-पुरखों की पूजा स्वरूप यह नृत्य किया जाता है। ग्रामीणों ने कहा, “यह महज मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से मिला वह ज्ञान है जिसे हम अपनी आने वाली ‘दादी की दादी’ तक पहुंचाना चाहते हैं।”

टिमकी और मांदर की थाप पर थिरके कदम

सुबह से ही गांव में उत्सव का माहौल रहा। पारंपरिक वेष-भूषा में सजे युवा और बुजुर्ग टिमकी, मांदर और टिसकी की थाप पर झूमते नजर आए। रीना और सैला गायन के जरिए पूर्वजों को याद किया गया। इस उत्सव की एक खास परंपरा के तहत ग्रामीणों ने एक-दूसरे के परिवार के ‘सैलाहार-सैलहरीन’ (नर्तक दल) को अपने घर ले जाकर भोजन कराया, जिसमें उड़द दाल से बने ‘बड़ा’ का मुख्य रूप से आनंद लिया गया।

गोटुल की परंपरा को जीवित रखने का संकल्प

आदिवासी समाज की अस्मिता उसके रीति-रिवाजों और तीज-त्योहारों में बसती है। ग्रामवासियों ने बताया कि यह कार्यक्रम खरना और गोटुल की परंपरा को जीवित रखने का एक प्रयास है। पेन-पुरखों से आने वाली फसल की उन्नति और सुख-समृद्धि की कामना के साथ इस वर्ष के कार्यक्रम का समापन हुआ।

इनकी रही गरिमामय उपस्थिति

कार्यक्रम में एडवोकेट नानकराम धुर्वे, वीरेंद्र धुर्वे, हरीश मरावी, उमेश मरावी, ओमकार मरावी, शंखू लाल मरावी, अकल सिंह मरावी, जयसिंह धुर्वे, फगुआ आरमो, राम सिंह धुर्वे, देवीसिंह कुशराम और गणेश प्रसाद धुर्वे उपस्थित रहे। साथ ही बसंती बाई आरमो, द्रोपत बाई धुर्वे, शांति बाई मरावी, रामकली धुर्वे, कविता धुर्वे और समरती धुर्वे सहित बड़ी संख्या में मातृशक्ति और युवा साथियों ने अपनी गौरवशाली विरासत में सहभागिता की।


रिपोर्ट- सुशील बंजारा, मोतीनाला, मवई


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