सूर्य की उपासना का महापर्व छठ पर्व शुरू
- नहाय-खाय से शुरू हुआ छठ पर्व
- 28 अक्टूबर को सूर्य को अध्र्य देकर होगा समापन
मंडला महावीर न्यूज 29. सूर्य की उपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ 25 अक्टूबर से शुरू हो गया, जो 28 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठी माता को सूर्य देवता की बहन माना जाता हैं। कहा जाता है कि छठ पर्व में सूर्य की उपासना करने से छठ माता प्रसन्ना होती हैं। यह पूजन परिवार में सुख शांति व संतान के सुखी जीवन के लिए की जाती है। छठ पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से शुरू होता है। बताया गया कि छठ पूजा की शुरुआत हो चुकी है. शनिवार 25 अक्टूबर को नहाय-खाय से शुरू हुआ। आज रविवार 26 अक्टूबर को खरना होगा। सोमवार 27 अक्टूबर को संध्या अध्र्य किया जाए और मंगलवार 28 अक्टूबर को प्रात: अध्र्य के साथ पूजा संपन्न होगी। पंडित नीलू महाराज ने बताया कि नहाय-खाय का दिन विशेष रूप से शुभ माना गया है, इस दिन भद्रावास योग भी बना, जो दोपहर 02.34 बजे से लेकर पूरी रात तक प्रभावी रहा। इसके साथ ही 27 अक्टूबर को दो महत्वपूर्ण योग बन रहे हैं। अतिगण्ड योग और सुकर्मा योग, इनमें से सुकर्मा योग पूरे दिन और रात्रि तक प्रभावी रहेगा। ये योग छठ पर्व के आयोजन के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
जानकारी अनुसार हिंदू धर्म में छठ पूजा का विशेष महत्व है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है। पंचाग के अनुसार छठ पूजा का यह पावन पर्व हर साल कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य की कामना के लिए रखा जाता है। यह सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। 36 घंटों तक कठिन नियमों का पालन करते हुए इस व्रत को रख जाता है। छठ पूजा का व्रत रखने वाले लोग 24 घंटो से अधिक समय तक निर्जल उपवास रखते हैं। छठ पर्व का मुख्य व्रत षष्ठी तिथि को रखा जाता है, लेकिन यह पर्व चतुर्थी से आरंभ होकर सप्तमी तिथि को प्रात: सूर्योदय के समय अध्र्य देने के बाद समाप्त होता है।
सूर्य भगवान की पूजा का विशेष महत्व
पंडित विजयानंद शास्त्री ने बताया कि इस साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि की शुरुआत 25 अक्टूबर से हुई। 28 अक्टूबर को प्रात: सूर्य को अध्र्य देने के बाद व्रत का समापन होगा। पंडित विजयानंद शास्त्री ने बताया कि छठ पूजा का पर्व पूर्वांचल यानी पूर्वोत्तर भारत के बड़े हिस्से में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार बिहार, उत्तर प्रदेश व नेपाल में मुख्य रूप से प्रचलित है। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र दरभंगा में इस पर्व का बड़ा महत्व है। अब यह त्यौहार देश के बड़े हिस्से में मनाया जाता है। इसी के अंतर्गत मंडला नगर में भी छठ का पर्व मनाया जाता है। छठ के तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य की पूजा फिर आखिरी दिन उगते हुए सूर्य को अध्र्य दिया जाता हैं। संध्या अध्र्य के लिए बांस की टोकरी में अध्र्य की सामग्री सूप में सजाई जाती है और इस सामग्री को लेकर व्रत रखने वाले परिवार अस्त हो रहे सूर्य को अध्र्य देने के लिए नदी, तालाब या घाट पर जाते हैं। सूर्य को जल और दूध का अध्र्य समर्पित किया जाता है और छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। वहीं उषा अध्र्य में उदय हो रहे सूर्य को अध्र्य समर्पित किया जाता है। व्रति उसी जगह पर फिर से इक_ा होते हैं, जिस जगह पर उन्होंने पूर्व संध्या को अध्र्य दिया था। संध्या अध्र्य की सारी प्रक्रिया को फिर से दोहराया जाता है। पूजा के बाद व्रत रखने वाले कच्चे दूध का शरबत पीकर व्रत का पारायण करते हैं।
पहला दिन – नहाय-खाय
आस्था का महापर्व चार दिन तक चलता है। इसका पहला दिन नहाय-खाय होता है। इस साल नहाय-खाय 25 अक्टूबर से शुरू हुआ। सूर्योदय 06 बजकर 28 मिनट पर हुआ। वहीं सूर्यास्त शाम 05 बजकर 42 मिनट पर हुआ। नहाय खाय के साथ छठ महापर्व का आरंभ हो जाता है। छठ के पहले दिन नहाय खाय से होती है, इस दिन व्रत रखने वाली महिला और पुरुष सिर्फ एक समय ही भोजन करते हैं। इसके साथ ही भोजन ग्रहण करने से पहले सूर्य भगवान को भोग लगाया जाता है। इस दिन अपने घर के पास किसी पवित्र नदी या कुंड में जाकर स्नान भी किया जाता है। स्नान करने से बाद साफ वस्त्र धारण करके ही भोजन ग्रहण करना होता है। इस दिन चने की दाल और लौकी की सब्जी बनाई जाती है। इसके साथ ही पहले दिन व्रत रखने वाले पहले खाना खाते हैं इसके बाद ही परिवार के बाकी लोग भोजन ग्रहण करते हैं।
दूसरा दिन – खरना
खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। खरना इस साल 26 अक्टूबर को है। इस दिन का सूर्योदय सुबह 06 बजकर 29 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 05 बजकर 41 मिनट पर होगा। छठ महापर्व के दूसरे दिन खरना किया जाता है। खरना का मतलब है शुद्धिकरण। व्रती इस पूरे दिन उपवास रखती है। फिर शाम के समय मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ की खीर प्रसाद के रूप में बनाई जाती है। इसी प्रसाद को व्रती ग्रहण करते हैं। फिर इस प्रसाद को बाकी लोगों में बांटा जाता है। इसके बाद से 36 घंटे का लंबा निर्जला उपवास शुरू होता है।
तीसरा दिन – सूर्य षष्ठी
छठ पूजा का तीसरा दिन संध्या अध्र्य का होता है। इस दिन छठ पर्व की मुख्य पूजा की जाती है। इस दिन व्रती घाट पर आते हैं और डूबते सूर्य को अध्र्य देते हैं। इससे पहले व्रत रखने वाली महिलाएं सूर्य निकलने से पहले रात को मिश्री युक्त पानी पीती हैं। उसके बाद शाम के समय सूर्यदेव को अध्र्य दिया जाता है। सूर्य देव की उपासना के लिए इस दिन तरह तरह के पकवान और मौसमी फल आदि अर्पित किए जाते हैं। इस साल छठ पूजा का संध्या अध्र्य 27 अक्टूबर को दिया जाएगा। इस दिन का सूर्योदय सुबह 6 बजकर 30 और सूर्यास्त शाम 05 बजकर 40 मिनट पर होगा।
चौथा दिन – छठ पर्व का समापन
चौथा दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को छठ महापर्व का अंतिम दिन होता है। इस दिन उगते सूर्य को अध्र्य दिया जाता है और व्रत का पारण का होता है। सूर्य देव को अध्र्य देते समय संतान और परिवार की सुख शांति बनाए रखने की कामना की जाती है। सूर्य को अध्र्य देने के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत का समापन किया जाता है। इस साल 28 अक्टूबर को उगते सूर्य को अध्र्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्योदय 06 बजकर 30 मिनट पर होगा और सूर्यास्त शाम 05 बजकर 39 मिनट पर होगा।
छठ पूजा की तिथि
- पहला दिन नहाय-खाय 25 अक्टूबर, शनिवार
- दूसरा दिन खरना 26 अक्टूबर, रविवार
- तीसरा दिन संध्या अध्र्य 27 अक्टूबर, सोमवार
- चौथा दिन पारण 28 अक्टूबर, मंगलवार










