बायोचार से खेती होगी टिकाऊ, बढ़ेगी मिट्टी की उर्वरता

टिकाऊ कृषि के लिए अनोखी पहल, किसान अब बना रहे हैं बायोचार

  • निवास के पायलीबाहुर में किसानों ने शुरू की बायोचार खेती
  • नाबार्ड और प्रदान संस्था की पहल
  • बायोचार से खेती होगी टिकाऊ, बढ़ेगी मिट्टी की उर्वरता

मंडला महावीर न्यूज 29. जलवायु परिवर्तन और लगातार घटती मिट्टी की उर्वरता की चुनौती से निपटने के लिए मंडला जिले के निवास ब्लॉक में एक नई और सराहनीय पहल की गई है। यहां के पायलीबाहुर गांव में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए एक नई तकनीक बायोचार को अपनाया जा रहा है। इस तकनीक से मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने के साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से भी निपटा जा सकता है। प्रदान संस्था और नाबार्ड के सहयोग से गठित वाटरशेड विकास समिति ने गांव में बायोचार इकाइयां स्थापित की हैं, जिनका उद्देश्य किसानों को पर्यावरण अनुकूल खेती के लिए प्रोत्साहित करना है।

जानकारी अनुसार बायोचार एक विशेष प्रकार का कोयला है, जिसे धान की भूसी, मक्का के डंठल, जगनी, रामतिला, राखड़ और अन्य स्थानीय कृषि अवशेषों को सीमित ऑक्सीजन की मौजूदगी में उच्च तापमान पर गर्म करके बनाया जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोलिसिस कहा जाता है। यह कार्बन-समृद्ध पदार्थ है, जो कृषि अवशेषों को एक ऐसे पदार्थ में बदल देती है जो लंबे समय तक मिट्टी में बना रहता है। इसे खेतों में डालने से न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है, बल्कि फसलें भी अधिक उत्पादन देती हैं।

बताया गया कि बायोचार मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उसकी नमी धारण क्षमता में सुधार करने में अत्यधिक प्रभावी है। यह मिट्टी में पानी को सोखने की क्षमता को बढ़ा देता है, जिससे सूखे या कम वर्षा की स्थिति में भी फसलें सुरक्षित रहती हैं। यही कारण है कि इसे जलवायु सहनशील खेती के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जा रहा है। यह तकनीक किसानों को रासायनिक खादों पर उनकी निर्भरता कम करने में भी मदद करेगा। जिससे उनकी लागत में कमी आएगी और मिट्टी की प्राकृतिक संरचना भी बनी रहेगी।

बायोचार के फायदे 

अनुरुद्ध शास्त्री ने बताया कि इस तकनीक से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा। बायोचार मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाता है और उसकी उर्वरता बढ़ाता है, जिससे फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है। इसके उपयोग से किसान धीरे-धीरे रासायनिक खादों का प्रयोग कम कर सकते हैं, जिससे खेती की लागत कम होती है। बायोचार कार्बन को मिट्टी में अवशोषित कर लेता है, जिससे वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा कम हो जाती है। यह तकनीक फसल अवशेषों को जलाने की समस्या का एक टिकाऊ समाधान है, जो वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। बायोचार मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे कम पानी में भी खेती संभव हो पाती है।

पायलीबाहुर में की गई पहल 

पायलीबाहुर गांव के किसान इस पहल को लेकर बहुत उत्साहित हैं। ग्राम की पहलवती और परवतराम सिंह ने पहले उत्पादन चक्र में ही लगभग 45 किलो बायोचार तैयार किया। इसी तरह गायत्री और दशरथ सिंह ने 35 किलो बायोचार एकत्र किया। किसानों का कहना है कि बायोचार को खेतों में मिलाने के बाद मिट्टी की ताकत बढ़ी है और उनकी फसलें पहले से ज्यादा हरी-भरी दिख रही हैं। इस सफल शुरुआत से क्षेत्र के किसानों को उम्मीद है कि यह तकनीक जल्द ही निवास ब्लॉक के अन्य गांवों तक भी पहुंचेगी और किसानों के लिए एक नया विकल्प बनकर उभरेगी। यह पहल न केवल आर्थिक रूप से किसानों को सशक्त करेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

इनका कहना है

पहले हमें मिट्टी में खाद डालने के बाद भी अच्छी पैदावार नहीं मिल रही थी। लेकिन मिट्टी परीक्षण के बाद अब बायोचार डालने से जमीन की ताकत लौटगी और हमें उम्मीद है कि अगली फसल और बेहतर होगी। इससे हमें रासायनिक खाद पर खर्च भी कम करना पड़ेगा।


पहलबती, महिला कृषक

बायोचार तकनीक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने का एक सशक्त उपाय है। इससे किसानों को बेहतर उत्पादन तो मिलेगा ही, साथ ही पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन घटाने में भी मदद मिलेगी। नाबार्ड की कोशिश है कि इस मॉडल को मंडला जिले के अन्य ब्लॉकों तक भी पहुँचाया जाए।


देवब्रत पाल, जिला विकास प्रबंधक, नाबार्ड

हमारा प्रयास है कि गाँव के किसान आधुनिक तकनीकों से जुड़कर आत्मनिर्भर बनें। बायोचार जैसी पहल से न केवल मिट्टी और फसल की सेहत सुधरेगी बल्कि किसानों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। आने वाले समय में अच्छे परिणाम आने के बाद इसे अन्य गाँवों तक ले जाकर और अधिक परिवारों को लाभान्वित किया जाएगा।


अनुरुद्ध शास्त्री, प्रदान संस्था



 

Leave a Comment

Recent Post

Live Cricket Update

Advertisements

Read More Articles