प्रकृति के साथ सामंजस्य और सतत विकास की आवश्यकता

अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस

  • प्रकृति के साथ सामंजस्य और सतत विकास की आवश्यकता
  • भारत और जैव विविधता, एक समृद्ध विरासत और चुनौतियां

मंडला महावीर न्यूज 29. 22 मई अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर इस वर्ष का विषय प्रकृति के साथ सामंजस्य और सतत विकास हमें प्रकृति के साथ अपने गहरे संबंध और जैव विविधता के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता की याद दिलाता है। जैव विविधता पृथ्वी पर सभी जीवन का आधार है और मानव जाति की आर्थिक समृद्धि के लिए मौलिक है।
भारत, दुनिया के शीर्ष 10 जैव विविधता वाले देशों में से एक है, जहां घने वर्षा वनों से लेकर तटीय आर्द्र भूमि तक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र हैं। यहां 45,000 से अधिक पौधों की प्रजातियां और 90,000 से अधिक पशुओं की प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें प्रतिष्ठित बंगाल टाइगर और भारतीय हाथी भी शामिल हैं। प्राचीन समय से ही भारत के ऋषि-मुनियों ने प्रकृति संरक्षण और मानव स्वभाव की गहरी जानकारी को समझते हुए प्रकृति के साथ मानवीय संबंध विकसित किए। पेड़ों की तुलना संतान से और नदियों को मां स्वरूप माना गया है, जो प्रकृति के प्रति आदर और संरक्षण की भावना को दर्शाता है।

जैव विविधता पर मंडराते खतरे 

हालांकि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, अति-दोहन और भूमि उपयोग परिवर्तन जैसी व्यापक समस्याएं जैव विविधता में गिरावट का कारण बन रही हैं। सुंदरबन जैसे मैंग्रोव वन समुद्र-स्तर में वृद्धि, कीचड़ की कमी और सिकुड़ते पर्यावासों जैसे तिहरे खतरे का सामना कर रहे हैं। जंगलों में आग भी वन और जैव विविधता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है।
केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने हाल ही में काठमांडू में सागरमाथा संवाद में हिमालय की बढ़ती पारिस्थितिकी अति संवेदनशीलता पर चिंता व्यक्त की, जो तेजी से ग्लेशियर पिघलने की ओर इशारा करता है। हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि के कारण प्रजातियां अधिक ऊंचाई की ओर जा रही हैं, जिससे उच्च-तुंगता पर वास करने वाले हिम तेंदुए जैसे जीवों के लिए खतरा उत्पन्न हो रहा है।
गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से गुजरने वाले पश्चिमी घाट भी अनियंत्रित उत्खनन, पहाडिय़ों और पेड़ों की कटाई, अत्यधिक बुनियादी ढांचे के विकास आदि बड़े पैमाने पर झेल रहे हैं, जबकि विशेषज्ञों ने इसे पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में घोषित करने का सुझाव दिया है।

जैव विविधता का महत्व और संरक्षण के उपाय 

जैव विविधता हमारे ग्रह के नाजुक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है। जंगल और घास के मैदान प्राकृतिक फिल्टर के रूप में हमारी हवा और पानी को शुद्ध करते हैं। विविध पारिस्थितिकी तंत्र मिट्टी की उर्वरता में योगदान करते हैं और मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। मधुमक्खियों और तितलियों जैसे कीट परागणकर्ता हमारी फसलों की सफलता सुनिश्चित करते हैं, जबकि अनगिनत अन्य प्रजातियां खाद्य श्रृंखला की नींव बनाती हैं, जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखती हैं। जैव विविधता के नुकसान के प्रमुख कारकों में प्रदूषण, आवास की हानि, शिकार, आक्रामक प्रजातियों की बढ़ोतरी, पसंदीदा प्रजातियों का अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं शामिल हैं। मछलियां, जिन्हें बायोइंडीकेटर माना जाता है, जलीय पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नर्मदा नदी पर बांधों के निर्माण से इसकी प्राकृतिक बहाव में रुकावट आई है, जिससे मध्य प्रदेश की राजकीय मछली महाशीर के अस्तित्व पर संकट आ गया है।

संरक्षण के लिए भारत का बहुआयामी दृष्टिकोण 

भारत में जैव विविधता के नुकसान से निपटने के लिए एक स्पष्ट बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जैव विविधता संरक्षण प्रयासों में मूल कारणों का समाधान होना चाहिए और यह स्थानीय समुदायों को शामिल करके ही किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा जैव विविधता संरक्षण कानून 2002 और इसके क्रियान्वयन के लिए मध्य प्रदेश में जैव विविधता नियम 2004 बनाया गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने 2005 में जैव विविधता बोर्ड का गठन भी किया है। हाल ही में, राज्य जैव विविधता बोर्ड की 17वीं बैठक में प्रदेश की जैव विविधता का दस्तावेजीकरण करने के लिए लोक जैव विविधता पंजी का निर्माण और इसे डायनेमिक डिजिटल लोक जैव विविधता पंजी के रूप में बनाने का निर्णय लिया गया। गिद्धों की घटती संख्या एक चिंता का विषय थी, लेकिन डाइक्लोफेनेक नामक पशु चिकित्सा दवा पर प्रतिबंध लगाने के सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। 2021 में मध्य प्रदेश में 9,446 गिद्ध थे, जो 2024 में 10,845 और 2025 की पहली गणना में 12,000 से अधिक पहुंच चुके हैं। ऐसे कई विलुप्त होते वनस्पति और जीव-जंतुओं को संरक्षित करना आवश्यक है।

स्वदेशी समुदायों की भूमिका 

राज कुमार सिन्हा, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के अनुसार पृथ्वी की अधिकांश जैव विविधता का प्रबंधन स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों द्वारा किया जाता है। यही कारण है कि यह सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि उन्हें प्रकृति की रक्षा और पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक समर्थन मिले। जैव विविधता का संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से ही संभव नहीं है, बल्कि इसमें जनभागीदारी और सामुदायिक सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।


 

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