लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार: मध्यप्रदेश में पत्रकारों के साथ बढ़ती बदसलूकी और हिंसा ने खड़े किए गंभीर सवाल
- संवाद की जगह बदतमीजी और मारपीट
- भोपाल से इंदौर तक पत्रकारों के अपमान पर रोष
- जांच की उठी मांग
मंडला महावीर न्यूज 29. मध्यप्रदेश में हाल के दिनों में पत्रकारों के साथ घटित हुई सिलसिलेवार घटनाओं ने प्रदेश के बौद्धिक और पत्रकार जगत को झकझोर कर रख दिया है। भोपाल में एक पत्रकार के साथ हुई मारपीट और उसके बाद इंदौर में एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा पत्रकार से की गई अभद्रता की घटनाओं ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की सुरक्षा और गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
व्यक्तिगत दुर्व्यवहार नहीं, यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला
इन घटनाओं को केवल व्यक्तिगत विवाद या कानून-व्यवस्था के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। जानकारों का मानना है कि पत्रकारों के साथ हिंसा, अपमान या धमकी भरा व्यवहार सीधे तौर पर प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने की कोशिश है। पत्रकार का मूल दायित्व निष्पक्ष होकर सच को सामने लाना और जनहित में सवाल पूछना है। यदि सत्ता और रसूख के बल पर इन सवालों को दबाया गया, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।
संवाद की जगह दबाव का रास्ता गलत
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से यह अपेक्षा की जाती है कि वे पत्रकारों के प्रति संवेदनशील और मर्यादित आचरण रखें। यदि किसी खबर या तथ्य पर असहमति है, तो उसका उत्तर संवाद और तर्क से दिया जाना चाहिए। संवाद की जगह बदसलूकी या शारीरिक हिंसा का रास्ता अपनाना यह दर्शाता है कि असहिष्णुता बढ़ रही है।
निष्पक्ष जांच और सुरक्षा की मांग
पत्रकार समुदाय और नागरिक समाज ने मांग की है कि भोपाल और इंदौर की घटनाओं की निष्पक्ष जांच की जाए। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई कर प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि पत्रकारों के सम्मान और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
यह स्पष्ट है कि जब तक पत्रकार सुरक्षित और स्वतंत्र होकर अपना काम नहीं कर पाएंगे, तब तक समाज की आवाज मुखर नहीं हो सकेगी। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए पत्रकारों का भयमुक्त होना अनिवार्य है।









