इतिहास का वह अनूठा क्षण, जब गुरु ने शिष्य के चरणों में नमन कर सौंपी आचार्य पद की जिम्मेदारी
- आचार्य पदारोहण दिवस-53 वर्ष पूर्व नसीराबाद में लिखी गई थी गुरु-शिष्य वात्सल्य की स्वर्णिम गाथा
मंडला महावीर न्यूज 29. आज 22 नवंबर का दिन जैन समाज और भारतीय अध्यात्म के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। आज से ठीक 53 वर्ष पूर्व इसी तारीख को गुरु और शिष्य के बीच वात्सल्य और त्याग का एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ था, जिसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है। यह वह दिन था जब संत शिरोमणि आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने अपने ही शिष्य मुनिश्री विद्यासागर को अपना आचार्य पद सौंपकर स्वयं को उनका शिष्य स्वीकार किया था।
जानकारी अनुसार 22 नवंबर 1972 को राजस्थान के अजमेर जिले के नसीराबाद स्थित श्री दिगंबर जैन नसियाजी मंदिर में प्रात: 9 बजे एक ऐतिहासिक धर्मसभा जुड़ी थी। आचार्य श्री ज्ञानसागर ने वृद्धावस्था और शारीरिक शिथिलता को देखते हुए समाधिमरण की भावना से अपना पद त्यागने का निर्णय लिया था। हालांकि निरीह वृत्ति के धारी मुनिश्री विद्यासागर इस पद को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन गुरु की आज्ञा और समाज के आग्रह के समक्ष उन्हें नतमस्तक होना पड़ा।
जब गुरु ने शिष्य की प्रदक्षिणा की
प्रत्यक्षदर्शियों और शास्त्रों के अनुसार आचार्य ज्ञानसागर जी ने मुनि विद्यासागर को अपने हाथों से आचार्य आसन पर बिठाया और स्वयं नीचे मुनि आसन पर बैठ गए। नवोदित आचार्य श्री विद्यासागर के आचार्य संस्कार करने के बाद वृद्ध गुरु ने उन्हें नमोस्तु किया और तीन प्रदक्षिणा लगाकर निवेदन किया, हे आचार्यश्री मैं आपके निर्देशन में सल्लेखना (समाधि) लेना चाहता हूं। आप मुझे अपना क्षपक (शिष्य) स्वीकार करें। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गई थीं।
51 वर्षों का स्वर्णिम कालखंड
आचार्य श्री विद्यासागर जी ने गुरु आज्ञा को शिरोधार्य कर न केवल 51 वर्षों तक आचार्य पद को सुशोभित किया, बल्कि हथकरघा, प्रतिभा स्थली, गौ-सेवा और पाषाण जिनालयों के निर्माण जैसे कार्यों से जन-जन का कल्याण किया। मुनि श्री प्रणम्यसागर की पंक्तियां इस त्याग को बखूबी बयां करती हैं, स्वयं शिष्य के चरणों में आ, बैठ अहं को गला दिया। आज इस ऐतिहासिक दिवस पर पूरा समाज उस महान गुरु-शिष्य परंपरा को नमन कर रहा है।










