राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस विशेष
- बिछिया के सुदेश ने ढ़ाई एकड़ में बनाया सैकड़ों दुर्लभ औषधीय पौधों का बगीचा
- निरोगी काया के लिए अनूठी पहल
मंडला महावीर न्यूज 29 आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला के भुआ बिछिया निवासी सुदेश नामदेव ने आयुर्वेद को जीवंत रखने के प्रयास में एक अनूठी पहल की है। पेशे से पर्यावरण प्रेमी और आयुर्वेद के जानकार सुदेश ने अपनी निजी ढाई एकड़ जमीन को एक औषधीय वन में बदल दिया है, जहां उन्होंने सैकड़ों दुर्लभ और उपयोगी पौधे उगाए हैं। यह बगीचा सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि निरोगी काया के लिए एक बड़ा प्रयास है। सुदेश ने ऐसे पौधों को संग्रहित और संरक्षित किया है जो दैनिक जीवन में होने वाली सामान्य बीमारियों से लेकर कई जटिल रोगों तक का इलाज करने में सक्षम हैं। उनका मानना है कि प्रकृति ने हमें स्वस्थ रहने के लिए सभी साधन दिए हैं, बस हमें उन्हें पहचानने और इस्तेमाल करने की आवश्यकता है।
सुदेश के ढ़ाई एकड़ में बनाए गए दुर्लभ औषधीय पौधों के बगीचें में कई ऐसे पौधे हैं जिनके औषधीय गुण हैरान कर देने वाले हैं। यहां गुड़मार जैसे पौधे हैं जो शुगर रोग में फायदेमंद हैं, तो पारिजात सायटिका के दर्द से राहत देता है। जहरीले जीव-जंतुओं के विष के लिए नाग दमनी और बवासीर के लिए नागदोन जैसे पौधे मौजूद हैं। विधारा गैंग्रीन के घावों को भरने में मदद करता है, और दहीमन का उपयोग शराब के नशे को कम करने के लिए किया जाता है।
सुदेश ने महिलाओं से संबंधित रोगों के लिए भी महत्वपूर्ण पौधे लगाए हैं, जैसे कि शिवलिंगी, जो गर्भाशय संबंधी समस्याओं और गर्भधारण में सहायक है। इसके साथ ही विजय सार शुगर और पेट रोगों के लिए, केवकन्द जोड़ों के दर्द के लिए और अमलतास पेट की सफाई के लिए उगाए गए हैं। किडनी की पथरी और रक्त स्राव के लिए जंगली प्याज, शरीर के अंदर और बाहर की गांठों के लिए कचनार, और मासिक धर्म व एलर्जी के लिए निर्गुंडी जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण पौधे भी इस बगीचे का हिस्सा हैं। सुदेश ने मलेरिया और टाइफाइड के लिए कुटज, माइग्रेन के लिए हल्दु और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए सफेद हल्दी व काली हल्दी भी संरक्षित की हैं।

धातु रोग और नपुंसकता जैसे समस्याओं के लिए महाबल, नागबला और अतिबाला जैसी दुर्लभ जड़ी-बूटियां भी इनके औषधीय बगीचें में मौजूद हैं। सुदेश नामदेव की यह पहल न केवल औषधीय पौधों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास भी है। उनका यह प्रयास समाज को प्रकृति से जुडऩे और प्राकृतिक तरीकों से स्वस्थ जीवन जीने का संदेश देने का प्रयास है।











