सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शिक्षकों में हड़कंप

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शिक्षकों में हड़कंप, टीईटी अनिवार्यता पर पुनर्विचार की मांग

  • राज्य सरकार से पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अपील
  • 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से मिले छूट
  • सरकार दायर करे पुनर्विचार याचिका
  • शिक्षक पात्रता परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हड़कंप
  • एसोसिएशन ने केंद्र और राज्य सरकार से मांगी राहत

मंडला महावीर न्यूज 29. सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले ने देश भर के शिक्षकों विशेषकर 2011 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों में भारी बेचैनी पैदा कर दी है। इस फैसले के अनुसार कक्षा 1 से 8 तक के सभी शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करना अनिवार्य है। इस अनिवार्यता को पूरा न करने वाले शिक्षकों को अपनी नौकरी और पदोन्नति से हाथ धोना पड़ेगा। ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मप्र ने इस फैसले को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया है और इसे थोपा हुआ निर्णय करार दिया है। बताया गया कि यह निर्णय शिक्षा का अधिकार अधिनियम पर आधारित है, जिसके तहत सभी शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा का प्रावधान है। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने 25 अगस्त 2010 को इस संबंध में एक नियमावली जारी की थी, जिसके बाद कई राज्यों में टीईटी लागू हुई। एसोसिएशन का मानना है कि जब भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों को नहीं बदला जा सकता, तो भर्ती हो जाने के बाद न्यूनतम योग्यता को कैसे बदला जा सकता है। 25 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षक, उस समय के नियमों के अनुसार योग्य थे।

एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि जब एनसीटीई ने 25 अगस्त 2010 को टीईटी को अनिवार्य किया था, तब राज्य सरकारों और शिक्षा विभाग का यह दायित्व था कि वे शिक्षकों से एक वचन पत्र भरवाते कि उन्हें टीईटी उत्तीर्ण करना होगा। ऐसा होता तो शिक्षक न्यायालय में अपना पक्ष रख सकते थे। उनका कहना है कि तमिलनाडु और महाराष्ट्र के मामले में आए इस फैसले में उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला।

मध्य प्रदेश के शिक्षकों पर पड़ा प्रभाव 

मध्यप्रदेश के शिक्षकों में भी इस फैसले को लेकर गहरी चिंता है। राज्य में 2005 से ही पात्रता परीक्षा के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति होती रही है और 2012 से टीईटी के अनुसार परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं। मप्र में शिक्षाकर्मी, संविदा शाला शिक्षक और गुरुजी जैसे विभिन्न संवर्गों की नियुक्तियां सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर ही हुई थीं। एसोसिएशन ने न्यायालय के उस निर्णय पर भी सवाल उठाया है जिसमें 5 साल से कम सेवा अवधि वाले शिक्षकों को टीईटी से छूट दी गई है। उनका कहना है कि यदि आरटीआई का कड़ाई से पालन कराना है, तो यह छूट क्यों दी गई? उनका सुझाव है कि यह अवधि 10 साल भी हो सकती थी और विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए न्यायालय को 2011 से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों को छूट देनी चाहिए थी।

एसोसिएशन की मांगें :

ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मप्र अध्यक्ष डीके सिंगौर और महासचिव सुरेश यादव ने कहा है कि वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों को नए नियमों के अनुसार अपनी योग्यता साबित करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस फैसले को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय से स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन की मांग की है।

एसोसिएशन ने मध्य प्रदेश सरकार से उत्तर प्रदेश और केरल की तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की अपील की है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार से भी इस मामले में अध्यादेश लाकर उन शिक्षकों के लिए टीईटी के नियमों को शिथिल करने का आग्रह किया है जो प्रावधान लागू होने से पहले नियुक्त किए गए थे। उनका तर्क है कि जब केंद्र सरकार निर्वाचन आयोग की नियुक्ति के मामले में अध्यादेश ला सकती है, तो इस मामले में भी ऐसा किया जाना चाहिए। यह मुद्दा अब कानूनी और राजनीतिक दोनों ही स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है, और लाखों शिक्षकों की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

इनका कहना है 

टीईटी की अनिवार्यता से 2011 के पहले नियुक्त हुए बेसिक शिक्षा के शिक्षकों में बेहत चिंता और निराशा आ गई है आत्म हत्या के मामले भी सुनने में आ रहे हैं ऐसे में मप्र सरकार को अपना वक्तव्य जारी करना चाहिए और शिक्षकों को इस संकट से उबारने के लिए अपने कदम से अवगत कराना चाहिए।

डीके सिंगौर, प्रदेश अध्यक्ष

ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मप्र



 

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