कूर बांधने की प्रथा, आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपरा

कूर बांधने की प्रथा, आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपरा

  • मृत पूर्वजों के सम्मान में की जाती है पूजा

मंडला महावीर न्यूज 29. देवरीकला बबलिया में कूर बांधने की प्रथा आदिवासियों में आदिकाल से चली आ रही परंपरा है। इस प्रथा के तहत मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति और उसे पूर्वजों से मिलाने के लिए एक विशेष स्थान पर पूजा-अर्चना की जाती है। बताया गया कि इसी प्रथा का निर्वहन ग्राम के कर्म सिंह वरकडे के पुत्र के निधन के बाद किया गया। ग्राम खैरमाई मंदिर के पास सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार कूर बांधने की प्रथा का कार्यक्रम संपन्न हुआ।

ग्राम के वरिष्ठ नागरिक भरत सिंह वरकडे ने इस परंपरा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनके परिवार में यह प्रथा पीढिय़ों से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार के बुजुर्गों द्वारा इस स्थान को कूर बांधने के लिए निश्चित किया गया है। मृत्यु के बाद परिवार के वृद्धजनों की आत्माओं की स्थापना इसी स्थान पर की जाती है। समय-समय पर उनकी पूजा-अर्चना कर उनका स्मरण किया जाता है और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। यह परंपरा मृत आत्मा को शांति प्रदान करने और उसे पुराने पीढिय़ों के परिवारजनों से मिलाने का एक तरीका है। इसी विश्वास के साथ मृतक के परिजन एक स्थान पर एकत्र होकर पूजा-अर्चना कर दिवंगत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते है। इस मौके पर पुराने पीढिय़ों के परिवारों से भी उनका मिलाप कराया जाता है। यह कूर बांधने की अनूठी प्रथा का निर्वहन आज भी किया जा रहा है।


 

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