मैंगो फेस्टिवल की चमक में गुमनाम मंडला के देसी आम
- बाजारों में बिक रहे सड़े और केमिकल युक्त फल
- प्रशासन पर चुप्पी का आरोप
- स्थानीय उत्पादकों को नहीं मिला मंच
- स्वास्थ्य पर मंडरा रहा खतरा
मंडला महावीर न्यूज 29. एक ओर जहां मंडला में इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर हेरिटेज द्वारा मैंगो फेस्टिवल का भव्य आयोजन गोंडी पब्लिक ट्रस्ट सभागार में किया गया, वहीं दूसरी तरफ जिले के स्थानीय बाजारों में सड़े हुए और खतरनाक रसायनों से पकाए गए आम खुलेआम बिक रहे हैं। इस विरोधाभास ने प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया गया कि विगत दिवस जिला मुख्यालय में मैंगो फेस्टिवल का शुभारंभ कलेक्टर सोमेश मिश्रा और जिला पंचायत सीईओ श्रेयांस कूमट ने किया। हालांकि इस आयोजन के मूल उद्देश्य पर तब प्रश्नचिह्न लग गया, जब मंडला के देसी आमों और स्थानीय उत्पादकों को इस मंच पर कोई विशेष पहचान या बढ़ावा नहीं मिल सका।
जानकारी अनुसार मंडला जिले में आम की कई पारंपरिक और स्वादिष्ट किस्में जैसे दसहरी, चौसा, बम्बईया और लंगड़ा आम सदियों से उगाई जाती रही हैं। इनका स्वाद और खुशबू बाजार में उपलब्ध अन्य आमों से कहीं बेहतर है। बावजूद इसके इन देशी किस्मों के प्रचार-प्रसार, ब्रांडिंग और संरक्षण के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। इसके उलट बाजारों में 30 से 40 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहे आमों में कैल्शियम कार्बाइड और इथीफोन जैसे हानिकारक रसायनों के प्रयोग की आशंका जताई जा रही है। ये रसायन मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं, जिससे पेट संबंधी बीमारियाँ और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं। इतने गंभीर खतरे के बावजूद खाद्य सुरक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की चुप्पी कई सवाल उठा रही है।
आयोजन पर उठे सवाल
स्थानीय किसानों और आम उत्पादकों का कहना है कि जब ऐसे बड़े आयोजनों से स्थानीय उपज और उनके उत्पादकों को उचित मंच ही नहीं मिलता, तो इनका लाभ केवल औपचारिकता तक ही सीमित रह जाता है। उनका मानना है कि यदि ऐसे फेस्टिवल मंडला की असली कृषि उपज को धरातल पर पहचान दिलाने में विफल रहते हैं, तो ये केवल दिखावा बन कर रह जाते हैं।
उपेक्षित हो रहे देशी आम
स्थानीयजनों का कहना है कि एक तरफ आमों का उत्सव मनाया जा रहा है और दूसरी तरफ सड़े हुए केमिकल से पके आमों की धड़ल्ले से बिक्री बाजार में हो रही है, जबकि मंडला की पहचान माने जाने वाले देशी आम उपेक्षित हो रहे हैं। यह स्थिति न केवल विरोधाभासी है, बल्कि प्रशासनिक सोच और प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करते है। स्थानीयजनों का मानना है कि मंडला की असली उपज और उसके मेहनती उत्पादकों को उनका हक और पहचान दिलाई जाए।











