मधुमक्खी संरक्षण के लिए बन गए हनी मेन

मधुमक्खी संरक्षण के लिए बन गए हनी मेन

  • हनी मैन के नाम से प्रसिद्ध है निशार कुरैशी
  • प्रदेश के कोने-कोने में पहुंचा रहे शहद की मिठास
  • शहद से दिला रहे जिले को पहचान
  • वनांचल के लोगों को मिल रहा रोजगार

मंडला महावीर न्यूज 29. शहद का नाम सुनते ही एक मिठास का एहसास होने लगता है। शहद में कई औषधीय गुण होते है, जो बेहद गुणकारी होने के साथ स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद भी है। विशेषज्ञ बताते है कि हनी बी माइंड में अपने घर का नक्शा बना लेती है, जो दिनभर परिश्रम करके सफल श्रमिक कहलाती है, पृथ्वी पर इनकी कई प्रकार की प्रजाति है, जिनमें कुछ प्रजातियां विलुप्त होती जा रही है। मधुमक्खियों का पर्यावरण में क्या योगदान है लोग अभी भी नहीं जानते है। विशेषज्ञों के अनुसार खेतों में अच्छे उत्पादन से लेकर फलों की ज्यादा आवक में भी मधुमक्खियों का योगदान होता है। इसलिए इनके छत्तों को जलाना नहीं चाहिए, वर्तमान में युवा मधुमक्खी पालन करके अपनी आय भी बढ़ा सकते है। ऐसे ही कुछ युवा मंडला जिले में है, जो मधुमक्खी पालन से अपनी पहचान बनाई है।

जानकारी अनुसार जिले में मधुमक्खियों के संरक्षण के लिए विगत 28 वर्षो से कार्य कर रहे निशार कुरैशी की पहचान हनी मैन के नाम से हो गई है। निशार ने शहद शिकारियों को जागरूक करने का प्रयास किया है, जिसमें ये सफल भी हुए। निशार ने ग्रामीण अंचल के हनी हंटर्स को वैज्ञानिक पद्धती से शहद निकालने के गुर सिखाए है। जिससे मधुमक्खियों का जीवन भी बचा रहे और ग्रामीण लोगों की आय में वृद्धि हो सके। निशार कुरैशी के प्रयास से अब स्थानीय लोग शहद उत्पादन कर आत्मनिर्भर भी बन रहे है।

मंडला आदिवासी बाहुल्य जिला है। यहां की प्राकृति में अनमोल जड़ी, बूटियां उपलब्ध है। वहीं औषधी के रूप में उपयोग किए जाने वाले शहद का यहां परंपरागत तरीके से उत्पादन किया जाता रहा है, जिससे मधुमक्खियों का जीवन समाप्त हो रहा था। अब लोगों को जागरूक और वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी उपलब्ध कराई है। पहले लोग शहद निकालने के लिए मधुमक्खी को जलाकर, धुंआ करके और वृक्षों की डाली काटकर मधुमक्खियों को मार देते थे। इन सबको देखते हुए जिले के निशार कुरैशी ने शहद शिकारियों को मधुमक्खी संरक्षण के लिए जागरूक किया। शिकारियों को वैज्ञानिक तरीके से शहद निकालने का प्रशिक्षण दिया। जिसके बाद से शहद शिकारी ही मधुमक्खियों के संरक्षक बन गए।

रोजगार से जुड़ रहे लोग 

निशार कुरैशी पिछले 28 वर्षो से मधुमक्खी के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे है। इन्होंने जिले में करीब दो सैकड़ा से अधिक लोगों को वैज्ञानिक तरीके से शहद निकालने के लिए प्रशिक्षित किया है। वहीं प्रदेश में करीब छह हजार से अधिक लोगों को वैज्ञानिक तरीके से शहद निकालने के लिए प्रशिक्षित कर चुके है। इन शिकारियों को प्रशिक्षित करने के साथ ये अब मधुमक्खी के सरंक्षक भी बन गए है, जिससे अब लोग एक छत्ते से एक से अधिक बार शहद का उत्पादन कर रोजगार से जुड़ रहे है। निशार ने एक कंपनी भी बनाई है, जिसमें लोगों से शहद खरीदकर कर स्थानीय बाजार में विक्रय के लिए देते है।

प्रसंस्करण ईकाई की स्थापना 

अधिकांश युवा सरकारी नौकरी के लिए ही प्रयास करते रहते हैं। सीमित संख्या में पद होने के कारण बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी है जो लक्ष्य लेकर आगे बढ़े तो फिर कोई बाधा उन्हें रोक नहीं सकी। बता दे कि राजीव कॉलोनी निवासी निशार कुरैशी शहद प्रसंस्करण इकाई से जिले के शहद की मिठास दूसरे जिले व प्रदेशों में पहुंचा रहे हैं। निशार का कहना है कि उन्हें प्रधानमंत्री सृजन योजनांतर्गत कॉर्पोरेशन बैंक से 5 लाख रुपए की सहायता मिली। इसके बाद उन्होंने प्रसंस्करण इकाई की स्थापना कर जिले के जंगल के शहद को नाम दिया और मार्केट उपलब्ध कराया।

असान नहीं था सफर 

उन्होंने शहद प्रसंस्करण ईकाई के लिए कई बैंकों के चक्कर काटे जिससे उन्हें ऋण के माध्यम से आर्थिक सहायता मिल सके। कई स्थानों पर उन्हें निराशा लगी। बहुत से बैंक को इनका आइडिया पंसद नहीं आया और घाटे का सौदा बताया। लेकिन निशार ने हार नहीं मानी और लगातार प्रयास करते रहे। वर्ष 2020 में उन्हें कॉर्पोरेशन बैंक से पांच लाख की मदद मिली। फिर कुछ ही सालों में टेस्ट ऑफ मंडला लाइफ हनी के साथ शहद को नाम दिया और महाकौशल के साथ ही विभिन्न जिलों में शहद को पहुंचाने काम शुरू किया। दूसरे जिले में लगनी वाले प्रदर्शनी मेले में अपने उत्पाद रखे जिसे लोगों ने पंसद भी किया। अब निशार सीडीवीडी संस्था के साथ वनोपज आधारित प्रोडक्ट निर्माण कर रहे हैं और मार्केट उपलब्ध करा रहे हैं। उनसे जुड़कर 100 से अधिक लोगों को रोजगार भी उपलब्ध हो रहा है।

जिला बन सकता है आत्म निर्भर 

शहद के बाद आचार, कुटकी, चटपटा महुआ, टेस्टी अलसी, आंवला केंडी, बेल केंडी, अदरक गुड़, कोम्बहनी आदि स्वास्थ्य बर्धक सामग्री का निर्माण कर रहेे हैं। जिससे वोकल फॉर लोकल को बढ़ावा मिल रहा है। निशार का कहना है कि जिले में वनोपज दूसरे जिले में पहुंच रहा है जहां से दूसरे प्रोडेक्ट के रूप में वापस जिले के लोग खरीद कर उपयोग कर रहे हैं। अगर शासकीय मदद से लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जाता है तो जिला आत्मनिर्भर बन सकता है। महुआ, शहद, हरण-बहेरा, आयुर्वेदिक दवाईयां, लकड़ी के उत्पादों से लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। इसके लिए महिला स्वयं सहायता समूह को भी जोड़ा जा सकता है।

शहद शिकारी वैज्ञानिक पद्धती से निकाल रहे शहद 

मधुमक्खी के छत्ते से शहद निकालने के लिए वैज्ञानिक पद्धती द्वारा मधुमक्खी को बिना नुकसान पहुंचाए इनके छत्ते से एक सीजन में दो बार तक शहद निकाल सकते हैं। सुरक्षा के लिए शहद शिकारियों को अब वैज्ञानिक तरीके से शहद निकालने के लिए निशार कुरेशी इन्हें डंक रहित ड्रेस, सीढ़ी, टार्च समेत अन्य सामग्री उपलब्ध कराते है। जिससे मधुमक्खी व शहद शिकारी दोनों सुरक्षित रहते है। मधुमक्खी के परागीकरण करने से फसलों एवं वनोपज में बढ़ोतरी होती है।



 

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