घुघरी तहसील में लापरवाही की हद पार
दफ्तर से गायब हो रहीं राजस्व फाइलें, न्याय के लिए सालों से भटक रहे पीडि़त
- अधिकारियों के पास नहीं कोई जवाब
- तीन बहनों के हक और चार भाइयों की पैतृक जमीन के मामलों में धांधली का आरोप
मंडला महावीर न्यूज 29. जिले का घुघरी तहसील कार्यालय इन दिनों अपनी बदहाली, घोर अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। इस कार्यालय से आम जनता के राजस्व मामलों की जरूरी सरकारी फाइलें गायब होना अब एक आम बात बन चुकी है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब दूर-दराज से आए पीडि़त इस संबंध में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल करते हैं, तो उनके पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं होता। तहसील के चक्कर काट-काटकर थक चुके पीडि़तों का सीधा आरोप है कि संबंधित पटवारी और तहसील के जिम्मेदार अधिकारियों की कथित मिलीभगत से इन कारनामों को अंजाम दिया जा रहा है।
पहला मामला- 5 साल से आदेश की नकल के लिए भटक रही ग्यारसी बाई
तहसील कार्यालय की इस घोर लापरवाही का एक बड़ा और संवेदनशील उदाहरण ग्राम खमतरा की निवासी ग्यारसी बाई यादव के मामले में देखने को मिला है। पीडि़त ग्यारसी बाई कुल तीन बहनें हैं और नियमानुसार पैतृक जमीन पर तीनों बहनों का बराबर का हक होना चाहिए। परंतु, नियमों को ताक पर रखकर जमीन का बराबर बंटवारा न करते हुए भारी विसंगतियां खड़ी कर दी गईं। पीडि़त महिला पिछले 5 वर्षों से लगातार तत्कालीन तहसीलदार द्वारा किए गए नामांतरण आदेश की प्रमाणित नकल की मांग कर रही हैं जिससे वे अपने हक की लड़ाई लड़ सकें। लेकिन इस गरीब महिला को सिर्फ दफ्तरों के चक्कर लगवाए जा रहे हैं और हर बार कार्यालय से एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है कि आपकी फाइल नहीं मिल रही है।
दूसरा मामला-चार भाइयों में से सिर्फ एक के नाम दर्ज कर दी पूरी पैतृक जमीन
तहसील की मनमानी का ऐसा ही एक और गंभीर मामला घुघरी निवासी दुर्गेश सिंह ठाकुर और भरत सिंह ठाकुर पिता हरनाम सिंह का सामने आया है। दोनों भाइयों ने तहसील प्रशासन पर धांधली के गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पैतृक जमीन पर सभी भाइयों का बराबर का विधिक अधिकार होता है। लेकिन घुघरी तहसील के कारनामे सबसे जुदा हैं। यहाँ एक पिता की चार संतानें होने के बावजूद नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए चारों भाइयों के बजाय सिर्फ एक ही व्यक्ति के नाम पर पूरी की पूरी जमीन दर्ज कर दी गई। जब पीडि़त भाई इस गड़बड़ी की शिकायत लेकर और अपना हक मांगने कार्यालय पहुंचते हैं, तो उन्हें बाबू से लेकर अधिकारियों तक गोल-गोल चक्कर कटवाए जाते हैं। पीडि़तों ने मायूस होकर सवाल उठाया है कि हम गरीब न्याय के लिए आखिर कहाँ जाएं।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
इन दोनों ही बड़े मामलों से साफ जाहिर होता है कि कहीं न कहीं तहसीलदार, अधीनस्थ राजस्व अमले और संबंधित हल्का पटवारी की आपसी सांठगांठ से इन जमीनी गड़बडिय़ों को अंजाम दिया गया है, जिसकी वजह से आज गरीब और लाचार लोग प्रताडि़त हो रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड और अलमारियों से जरूरी फाइलें गायब होना बेहद संवेदनशील मामला है, जो सीधे तौर पर प्रशासनिक पारदर्शिता और सुरक्षा पर सवालिया निशान लगाता है।









