3500 किमी की कठिन पदयात्रा में ‘मोती’ स्वान भी बना साथी

अद्भुत आस्था: हाथों के बल ‘अधोमुखी’ नर्मदा परिक्रमा कर रहे संत धर्मपुरी महाराज

3500 किमी की कठिन पदयात्रा में ‘मोती’ स्वान भी बना साथी

  • रामनगर के कालापहाड़ मार्ग पहुँचा जत्था
  • संत धर्मपुरी महाराज के साथ मोती (स्वान) भी बना साथी

मंडला महावीर न्यूज 29.  नर्मदा तटों पर आस्था के कई रूप देखने को मिलते हैं, लेकिन इन दिनों मंडला जिले से गुजर रही एक परिक्रमा चर्चा का केंद्र बनी हुई है। डिंडोरी जिले के करंजिया निवासी संत धर्मपुरी महाराज माँ नर्मदा की लगभग 3500 किलोमीटर लंबी ‘पूर्ण परिक्रमा’ हाथों के बल अधोमुखी होकर कर रहे हैं। उनकी इस कठिन साधना को देख हर कोई दांतों तले उंगली दबा रहा है।

प्रतिदिन 3 से 4 किलोमीटर का सफर

जानकारी अनुसार संत धर्मपुरी महाराज ने अपनी इस आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत 13 दिसंबर को अमरकंटक से की थी। वे सामान्य रूप से चलने के बजाय अपने हाथों के बल पर शरीर का भार संतुलित कर प्रतिदिन 3 से 4 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। वर्तमान में उनकी यह यात्रा मंडला जिले के रामनगर से होते हुए कटंगा और कालापहाड़ मार्ग तक पहुँच चुकी है, जहाँ ग्रामीण और श्रद्धालु जगह-जगह उनका भव्य स्वागत कर रहे हैं।

भक्ति में लीन ‘मोती’ स्वान बना आकर्षण

इस परिक्रमा की एक और विलक्षण बात उनके साथ चल रहा “मोती” नाम का स्वान (कुत्ता) है। मोती न केवल महाराज के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है, बल्कि वह उनकी दिनचर्या का भी पूर्ण पालन करता है। दिनभर की कठिन यात्रा के बाद शाम को जब महाराज एक समय का साधारण भोजन ग्रहण करते हैं, तभी मोती भी अपना आहार लेता है। पशु और संत के बीच का यह अनूठा सामंजस्य श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल और माँ नर्मदा के चमत्कार का विषय बना हुआ है।

चौथी परिक्रमा में कठिन तपस्या

बताया जाता है कि संत धर्मपुरी महाराज मात्र सात वर्ष की आयु से ही साधु-संतों की शरण में हैं। यह उनकी चौथी नर्मदा परिक्रमा है, लेकिन यह पहली बार है जब वे इतनी कठिन ‘अधोमुखी’ मुद्रा में यात्रा कर रहे हैं। इस यात्रा में उनके साथ संत सुमन गिरी, हनुमान गिरी, तपस्या पुरी और प्रदीप पुरी भी निरंतर चल रहे हैं।अमरकंटक से शुरू हुई यह तपस्या अब जन-जन की आस्था का केंद्र बन गई है। मार्ग में पड़ने वाले गाँवों के लोग महाराज के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं और उनकी अटूट श्रद्धा को नमन कर रहे हैं।



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