आदि उत्सव विशेष
रामनगर के पत्थरों में कैद है गोंडवाना का स्वर्णिम इतिहास
- 17वीं शताब्दी के मोती महल से चौगान मढिय़ा तक आस्था और स्थापत्य की अनूठी गाथा
- रामनगर के ऐतिहासिक महलों में जीवित है गोंडवाना का गौरवशाली इतिहास
मंडला महावीर न्यूज 29. नर्मदा के पावन तट पर स्थित रामनगर की धरती आज भी उस गौरवशाली इतिहास की गवाह है, जिसने सदियों तक मध्य भारत की राजनीति और संस्कृति को दिशा दी। 17वीं शताब्दी में गोंड राजा हृदय शाह द्वारा बसाई गई यह राजधानी केवल ईंट-पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि गोंडवाना साम्राज्य के वैभव, सैन्य कौशल और सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत दस्तावेज है। आदि उत्सव के पावन अवसर पर रामनगर के ये ऐतिहासिक महल और मंदिर एक बार फिर अपनी प्राचीन विरासत की स्मृतियों को जीवंत कर रहे हैं।
इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि 1651 से 1667 ईस्वी के मध्य, जब बुंदेला आक्रमणों के कारण चौरागढ़ की सुरक्षा खतरे में पडऩे लगी थी, तब राजा हृदय शाह ने नर्मदा के तट पर रामनगर को अपनी नई राजधानी के रूप में चुना। रामनगर का चयन केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता के कारण नहीं, बल्कि सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था। यहाँ निर्मित भवनों में गोंड, मुगल और राजपूत स्थापत्य शैलियों का ऐसा अनूठा संगम मिलता है जो उस समय की वास्तुकला की उत्कृष्टता को दर्शाता है।
मोती महल-जहाँ दर्ज है 54 गोंड राजाओं की वंशावली
रामनगर का सबसे भव्य और आकर्षक स्मारक मोती महल है। नर्मदा के दक्षिणी तट पर स्थित यह तीन मंजिला महल सुरक्षा और सौंदर्य का बेजोड़ नमूना है। विशाल वर्गाकार आंगन और मध्य में स्थित बावड़ी इसकी वास्तुकला को विशिष्ट बनाती है। मोती महल की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धरोहर वह शिलालेख है, जिसमें गढ़ा-मंडला के 54 गोंड राजाओं की वंशावली उत्कीर्ण है। यह शिलालेख इतिहासकारों के लिए गोंड वंश के क्रमिक इतिहास को समझने का सबसे विश्वसनीय स्रोत है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस महल का निर्माण अलौकिक शक्तियों की सहायता से अत्यंत कम समय में किया गया था, जो आज भी कौतूहल का विषय है।

बेगम महल-प्रेम और इंडो-इस्लामिक वास्तुकला की मिसाल
राजा हृदय शाह ने अपनी रानी चिमनी बेगम की स्मृति में बेगम महल का निर्माण कराया था। काले पत्थरों से निर्मित यह तीन मंजिला आयताकार महल इंडो-इस्लामिक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। महल के चारों कोनों पर बने सुंदर गुंबद, मेहराबदार छतें और नर्मदा की ओर उतरती सीढिय़ां इसकी भव्यता में चार चाँद लगाती हैं। वर्तमान में यह स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है और यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में भी शामिल है, जो इसके वैश्विक महत्व को रेखांकित करता है।

प्रशासनिक और सैन्य शक्ति के प्रतीक-राय भगत की कोठी और दलबादल महल
मोती महल के समीप ही राजा के विश्वस्त दीवान के लिए निर्मित राय भगत की कोठी स्थित है। यह भवन अपनी सममित वास्तु योजना के लिए प्रसिद्ध है। इसकी छतों पर की गई रंगीन नक्काशी तत्कालीन कला प्रेम को दर्शाती है। वहीं दलबादल महल उस दौर की सैन्य शक्ति का प्रतीक था। यह महल मुख्य रूप से सेनापतियों और सैनिकों के विश्राम व रणनीतिक चर्चा का केंद्र था, जहाँ से पूरे साम्राज्य की रक्षा के फैसले लिए जाते थे।

चौगान मढिय़ा-जनजातीय आस्था का अटूट केंद्र
महलों के वैभव के बीच चौगान मढिय़ा आस्था का वह केंद्र है, जहाँ आज भी जनजातीय समाज की आत्मा बसती है। इसे गोंड राजवंश की कुलदेवी का स्थान माना जाता है। राजा हृदय शाह किसी भी बड़े अभियान से पहले यहाँ देवी का आशीर्वाद लेते थे। आज भी राजकीय मड़ई उत्सव और नवरात्रि के दौरान यहाँ हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। यहाँ की पवित्र धूनी को कष्ट निवारक माना जाता है, जहाँ नौ दिनों तक साधक कठिन सेवा और साधना करते हैं।

आदि उत्सव-विरासत के संरक्षण का संकल्प
रामनगर का यह ऐतिहासिक परिसर केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आदिवासियों की अस्मिता का प्रतीक है। आदि उत्सव के माध्यम से शासन और प्रशासन इन धरोहरों के संरक्षण का संदेश दे रहे हैं। गोंड शासकों द्वारा स्थापित समावेशी शासन, कला संरक्षण और सामाजिक समरसता की यह परंपरा आज के आधुनिक समाज के लिए भी एक बड़ी सीख है। रामनगर की ये खामोश दीवारें आज भी हर आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु को गोंडवाना के उस स्वर्णिम काल की याद दिलाती हैं, जहाँ शक्ति, भक्ति और कला का अद्भुत संगम हुआ था। आने वाली पीढिय़ों के लिए इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेज कर रखना ही आदि उत्सव की सार्थकता होगी।










