गरुण ऐप से लुप्त प्राय गिद्धों पर रखी जाएगी नजर

कान्हा टाइगर रिजर्व में 22 मई से शुरू होगी गिद्ध गणना

गरुण ऐप से लुप्त प्राय पक्षियों पर रखी जाएगी नजर

  • शीतकालीन गणना में मिले थे 224 गिद्ध
  • 13 वन परिक्षेत्रों में चलेगा अभियान
  • कान्हा प्रबंधन ने डाइक्लोफेनेक दवा के उपयोग पर रोक लगाने की अपील की

मंडला महावीर न्यूज 29. प्रकृति के सफाई कर्मचारी कहे जाने वाले गिद्धों के संरक्षण और उनकी आबादी के सटीक आंकलन के लिए मध्यप्रदेश वन विभाग एक बार फिर सक्रिय हो गया है। प्रदेशव्यापी अभियान के तहत आगामी 22 से 24 मई के मध्य कान्हा टाइगर रिजर्व सहित प्रदेश के विभिन्न वन क्षेत्रों में ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना का कार्य संपन्न किया जाएगा। इस अभियान को लेकर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकारियों को विस्तृत दिशा-निर्देश और तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया।कान्हा टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने बताया कि यह गणना कोर क्षेत्र, बफर वनमंडल और फेन अभयारण्य के अंतर्गत आने वाले समस्त 13 वन परिक्षेत्रों में एक साथ आयोजित की जाएगी। गणना कार्य को पूरी तरह वैज्ञानिक और पारदर्शी बनाने के लिए इस बार उन्नत डिजिटल मोबाइल ऐप गरुण का उपयोग किया जाएगा। इसके साथ ही फील्ड स्टाफ पारंपरिक प्रपत्रों के माध्यम से भी डेटा संकलित करेगा। वर्तमान में कान्हा प्रबंधन द्वारा मैदानी कर्मचारियों को इस विशेष ऐप के संचालन और गिद्धों की पहचान का गहन प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

शीतकालीन गणना के उत्साहजनक मिले परिणाम 

बताया गया कि इससे पूर्व फरवरी 2026 में संपन्न हुई शीतकालीन गणना के दौरान कान्हा, किसली और सरही वन परिक्षेत्रों में उत्साहजनक परिणाम देखने को मिले थे। उस समय कुल 224 गिद्ध दर्ज किए गए थे और विभिन्न वृक्षों पर उनके 50 सक्रिय घोंसले भी चिन्हित किए गए थे। आगामी ग्रीष्मकालीन गणना से यह स्पष्ट हो सकेगा कि क्षेत्र में गिद्धों की संख्या में कितनी वृद्धि हुई है और उनके आवास स्थल कितने सुरक्षित हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य हैं गिद्ध 

भारत में गिद्धों की कुल 09 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 07 प्रजातियां अकेले मध्यप्रदेश में मौजूद हैं। कान्हा टाइगर रिजर्व विशेष रूप से व्हाइट-बैक्ड गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, हिमालयन ग्रिफॉन, लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध और किंग वल्चर जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियों का घर है। बताया गया कि गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र (ईको-सिस्टम) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये मृत पशुओं के शवों का तेजी से भक्षण कर उन्हें पर्यावरण से हटाते हैं, जिससे पशुओं से फैलने वाली बीमारियों और संक्रमण के प्रसार पर रोक लगती है। यदि गिद्धों की संख्या घटती है, तो पर्यावरण की नैसर्गिक सफाई व्यवस्था ठप हो सकती है।

डाइक्लोफेनेक गिद्धों के लिए है धीमा जहर 

विशेषज्ञों के अनुसार गिद्धों की आबादी में गिरावट का सबसे बड़ा कारण पशु उपचार में उपयोग की जाने वाली दवा डाइक्लोफेनेक है। जब गिद्ध ऐसे मृत पशुओं का सेवन करते हैं जिनका उपचार इस दवा से हुआ हो, तो उनकी किडनी फेल हो जाती है और उनकी मृत्यु हो जाती है। इसके अलावा मृत पशुओं के शवों में विषाक्त पदार्थ मिलाना और प्लास्टिक कचरा भी इनके लिए बड़ा खतरा है।

कान्हा प्रबंधन की अपील 

गिद्धों के अस्तित्व को बचाने के लिए कान्हा टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने आमजन और पशुपालकों से भावुक अपील की है। प्रबंधन ने आग्रह किया है कि पशुओं के उपचार में डाइक्लोफेनेक दवा का उपयोग पूरी तरह बंद करें। मृत पशुओं के शवों में किसी भी प्रकार का जहर या कीटनाशक न मिलाएं। जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों जैसे गिद्धों के प्राकृतिक आवासों को नुकसान न पहुँचाएँ। प्लास्टिक कचरे का सही निपटान करें जिससे वह वन्यजीवों के भोजन चक्र में न पहुँचे। कान्हा प्रबंधन का कहना है कि जन-भागीदारी और जागरूकता के बिना इन दुर्लभ पक्षियों का संरक्षण संभव नहीं है। 22 मई से शुरू होने वाली यह गणना भविष्य की संरक्षण नीतियों के निर्धारण में मील का पत्थर साबित होगी।


Leave a Comment