जंगलों में दहक उठे ‘पलाश’

जंगलों में दहक उठे ‘पलाश’

केसरिया फूलों ने दिया फागुन और होली का संदेश

  • प्रकृति का श्रृंगार: मंडला के पहाड़ों और जंगलों में पलाश की बहार
  • औषधीय गुणों से महका वातावरण
  • रसायनों को छोड़ प्राकृतिक रंगों की ओर लौटें
  • पलाश के फूलों से सजने लगा होलिकोत्सव का बाजार

मंडला महावीर न्यूज 29. फागुन मास के आगमन के साथ ही जिले के जंगलों और ग्रामीण अंचलों में पलाश (टेसू) के फूलों ने केसरिया छटा बिखेरनी शुरू कर दी है। चिलचिलाती धूप और गर्मी की दस्तक के बीच पलाश के ये फूल न केवल प्रकृति के सौंदर्य में चार चाँद लगा रहे हैं, बल्कि आगामी होलिकोत्सव का संदेश भी दे रहे हैं। दूर से देखने पर ये पेड़ ऐसे प्रतीत होते हैं मानो किसी ने शाखाओं पर दहकते अंगारे सजा दिए हों।

औषधीय गुणों की खान है पलाश

आयुर्वेद में पलाश का विशेष महत्व है। विशेषज्ञों और बुजुर्गों के अनुसार, इसके फूलों से बने प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं और नेत्र ज्योति बढ़ाने में भी सहायक हैं। इसके बीजों को नींबू के रस के साथ मिलाकर लगाने से चर्म रोगों में आराम मिलता है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसकी छाल का उपयोग पथरी और यकृत रोगों के उपचार में किया जाता है।

पर्यावरण और आजीविका का आधार

पलाश न केवल स्वास्थ्य बल्कि ग्रामीण आजीविका का भी बड़ा जरिया रहा है। इसके पत्तों से बने दोने-पत्तल पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। हालांकि डिस्पोजल के बढ़ते चलन ने इसे प्रभावित किया है, लेकिन प्रदूषण कम करने के लिए इन्हें पुनः बढ़ावा देने की आवश्यकता है। मंडला जिले में सामान्य केसरिया पलाश के साथ-साथ अत्यंत दुर्लभ ‘सफेद पलाश’ भी देखा गया है।परंपरागत रूप से पूर्वज पलाश के फूलों को गर्म पानी में उबालकर प्राकृतिक रंग तैयार करते थे। आज के केमिकल युक्त रंगों के दौर में पलाश का यह प्राकृतिक विकल्प सेहत और परंपरा दोनों को सहेजने का बेहतरीन माध्यम है।



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