सूखा, जलवायु परिवर्तन और सरप्लस जल का गणित

केन-बेतवा लिंक परियोजना

क्या केन में सचमुच अतिरिक्त पानी है? CEC की आपत्तियों ने हाइड्रोलॉजिकल आधार पर खड़े किए गंभीर सवाल

  • सूखा, जलवायु परिवर्तन और ‘सरप्लस’ जल का गणित
  • केन-बेतवा परियोजना के जल-आकलन पर फिर उठी स्वतंत्र समीक्षा की मांग

विशेष रिपोर्ट

विशेष प्रतिनिधि

मंडला महावीर न्यूज 29.  देश की पहली महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना ‘केन-बेतवा लिंक’ भले ही निर्माण के चरण में पहुँच चुकी हो, लेकिन केन नदी में पानी की वास्तविक उपलब्धता और इसे ‘सरप्लस’ (अधिशेष) घोषित करने के आधार पर विवाद थम नहीं रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल इम्पावर्ड कमिटी (सीईसी) और जल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वार्षिक औसत के आधार पर किसी नदी को सरप्लस मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से जोखिम भरा हो सकता है।

सरकारी अनुमान बनाम सेंट्रल इम्पावर्ड कमिटी (CEC) की आपत्तियाँ

सरकारी अनुमानों के अनुसार, दौधन बांध स्थल पर केन नदी में 75 प्रतिशत विश्वसनीयता के आधार पर लगभग 6,188 से 6,590 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) जल उपलब्ध रहता है। पारिस्थितिक व अपस्ट्रीम आवश्यकताओं को घटाने के बाद सरकार 1,074 एमसीएम पानी को अधिशेष मानकर बेतवा बेसिन में भेजने की योजना बना रही है।

हालांकि, सीईसी ने अपनी आपत्तियों में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु उठाए हैं:

  • मानसूनी निर्भरता और सूखे का जोखिम: केन और बेतवा दोनों नदियाँ एक ही मानसूनी क्षेत्र में आती हैं जहाँ औसत वर्षा लगभग 90 सेमी है। कम वर्षा या सूखे के वर्षों में जब बेतवा को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होगी, उसी समय केन में भी जलप्रवाह कम हो जाएगा।
  • अपर केन के भविष्य पर असर: केन नदी के ऊपरी जलग्रहण (अपर केन) क्षेत्र में सिंचाई का विकास अभी सीमित है। यदि केन के पानी को पहले ही लोअर केन और अपर बेतवा के लिए प्रतिबद्ध कर दिया गया, तो केन बेसिन के स्थानीय किसानों के लिए भविष्य की योजनाओं की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।
  • अस्थायी जल उपलब्धता बनाम वार्षिक औसत: मानसूनी बाढ़ के दौरान कुछ हफ्तों के लिए अत्यधिक पानी आना यह साबित नहीं करता कि नदी साल भर सरप्लस है। जलवायु परिवर्तन के कारण जलप्रवाह में अनिश्चितता और तेजी से उतार-चढ़ाव बढ़ रहा है।

वैश्विक संदर्भ और जल संकट की चेतावनी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल वाटर रिसोर्सेज 2025’ के अनुसार, पृथ्वी का प्राकृतिक जल चक्र बेहद अस्थिर हो गया है। वर्ष 2025 पिछले 35 वर्षों में सबसे सूखे वर्षों में दर्ज हुआ है और 36 प्रतिशत नदी बेसिनों में सामान्य से कम प्रवाह देखा गया है। ऐसे समय में बड़े इंटर-बेसिन ट्रांसफर से पहले स्थानीय जल-संचयन तकनीकों को प्राथमिकता देने की सिफारिश की गई है।

स्थानीय विकल्प और नीतियां

विशेषज्ञों के अनुसार बुंदेलखंड में पानी की समस्या केवल जल की कुल मात्रा की नहीं, बल्कि वर्षा-अपवाह (Run-off) प्रबंधन और स्थानीय जल-संचयन से जुड़ी है। यदि बड़े बाँधों और लिंक नहरों के बजाय पारंपरिक तालाबों, चेक डैम, खेत-तालाबों और वॉटरशेड संरचनाओं के जरिए बारिश के पानी को स्थानीय स्तर पर रोका जाए, तो कम लागत और कम पर्यावरणीय नुकसान के साथ भूजल को रिचार्ज किया जा सकता है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति और ₹44,605 करोड़ का बजट

आपत्तियों के बावजूद यह परियोजना राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना की प्राथमिकता में शामिल है। लगभग ₹44,605 करोड़ की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना में केंद्र सरकार ₹39,317 करोड़ की आर्थिक सहायता दे रही है। बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त क्षेत्र के लिए एक राजनीतिक समाधान पेश करने के कारण इस परियोजना को संस्थागत और राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है।

केन-बेतवा परियोजना के संदर्भ में मूल प्रश्न यह नहीं है कि आज नदी में कितना पानी दिख रहा है, बल्कि यह है कि क्या भविष्य की स्थानीय आवश्यकताओं, सूखे के वर्षों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए वास्तव में हस्तांतरणीय अधिशेष जल मौजूद है? जल वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं से यह मांग उठ रही है कि परियोजना के निर्माण के साथ-साथ एक स्वतंत्र और सार्वजनिक रूप से सत्यापित जल-विज्ञान (Hydrological) आकलन पुनः कराया जाए।


(राज कुमार सिन्हा, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के विश्लेषणात्मक विचारों पर आधारित)


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