पति की लंबी उम्र के लिए महिलाओं ने वट वृक्ष पर बांधा रक्षा सूत्र

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मंडला में आस्था का अनूठा उत्सव

पति की लंबी उम्र के लिए महिलाओं ने वट वृक्ष पर बांधा रक्षा सूत्र

  • वट सावित्री, शनि जयंती और शनिश्चरी अमावस्या का बना दुर्लभ महासंयोग
  • शनि मंदिरों में उमड़ी भक्तों की भारी भीड़

मंडला महावीर न्यूज 29. मंडला जिले सहित संपूर्ण ग्रामीण अंचलों में वट सावित्री का पावन व्रत श्रद्धा, पारंपरिक हर्षोल्लास और एक अत्यंत दुर्लभ आध्यात्मिक संयोग के साथ मनाया गया। इस वर्ष वट सावित्री व्रत के दिन न केवल ज्येष्ठ अमावस्या रही, बल्कि सूर्यपुत्र भगवान शनिदेव की जयंती भी पूरे श्रद्धाभाव से मनाई गई। शनिवार के ही दिन अमावस्या और शनि जयंती का यह शनिश्चरी अमावस्या का त्रिवेणी महासंयोग वर्षो बाद बना है, जिसने इस दिन के धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व को कई गुना बढ़ा दिया। इस विशेष मौके पर सुहागिन महिलाओं ने अखंड सौभाग्य के लिए व्रत रखा, तो वहीं श्रद्धालुओं ने न्याय के देवता शनिदेव की विशेष आराधना की।

धार्मिक स्थलों और घाटों पर सुबह से उमड़ी भीड़ 

शनिवार सुबह से ही जिला मुख्यालय के रानी पार्क, खैरमाई मंदिर बिंझिया, शीतला मंदिर रपटा घाट सहित विभिन्न क्षेत्रों में स्थित वट वृक्षों के समीप महिला उपासकों की भारी भीड़ देखी गई। महिलाओं ने अलग-अलग समूहों में पारंपरिक मांगलिक गीतों के बीच पूजा की थाली सजाकर वट वृक्ष को धूप, दीप, नैवेद्य, रोली और अक्षत अर्पित किए।

कच्चे धागे से की परिक्रमा, सुना सत्यवान-सावित्री का प्रसंग 

पूजन के दौरान महिलाओं ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाने वाली पतिव्रता सती सावित्री की कथा सुनी। इसके बाद महिलाओं ने वट वृक्ष के चारों ओर कच्चे धागे को लपेटते हुए परिक्रमा की और अपने परिवार के कल्याण की कामना की। इसके साथ ही शनिश्चरी अमावस्या के पावन अवसर पर महिलाओं और श्रद्धालुओं ने पवित्र पौधों की परिक्रमा कर दान-पुण्य भी किया।

त्रिदेव के वास वाले वट वृक्ष की महिमा 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वट यानी बरगद के पेड़ में साक्षात त्रिदेव (भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का वास होता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन बरगद की पूजा करने से पति के जीवन में आने वाली सभी अदृश्य बाधाएं और अकाल मृत्यु का भय टल जाता है। यह व्रत वैवाहिक जीवन को सुरक्षा प्रदान करता है और संतान प्राप्ति की मनोकामना को भी पूर्ण करने वाला माना गया है।

शनि जयंती पर गूंजे जयकारे 

इस बार शनिवार के दिन ही शनि जयंती और अमावस्या का योग होने से जिले के शनि मंदिरों में अभूतपूर्व उत्साह देखा गया। जिले के शनि मंदिरों सहित अन्य देव स्थानों पर सुबह से ही शनिदेव को तेल, काले तिल, नीले फूल और शमी पत्र अर्पित करने के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं। ज्योतिषविदों के अनुसार शनिवार, अमावस्या और शनि जयंती का यह अनूठा संयोग शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या से मुक्ति के लिए बेहद फलदायी रहा, जिसके चलते लोगों ने बढ़-चढ़कर दान-पुण्य और अनुष्ठान किए।


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