तीन पीढिय़ों से काबिज ग्रामीणों को मिला बेदखली का नोटिस

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कोरगाँव में 100 परिवारों के आशियाने पर संकट

तीन पीढिय़ों से काबिज ग्रामीणों को मिला बेदखली का नोटिस

  • उपजाऊ भूमि पर सरकारी निर्माण की तैयारी
  • कोरगाँव के ग्रामीणों ने प्रशासन से लगाई सुरक्षा की गुहार
  • उजड़ जाएगी रोजी-रोटी

मंडला महावीर न्यूज 29. जिला मुख्यालय के समीप स्थित ग्राम पंचायत कोरगाँव में इन दिनों सन्नाटा और डर का माहौल है। यहाँ के लगभग 100 परिवार जो मालगुजारी के समय से यानी पिछली तीन पीढिय़ों से खसरा नंबर 508, 50, 409 और 1086 की भूमि पर काबिज हैं, उनके सामने अब बेघर होने का संकट खड़ा हो गया है। जिला प्रशासन द्वारा इस सिंचित और उपजाऊ भूमि पर सरकारी निर्माण कार्य कराने के लिए चयन किया गया है, जिसके चलते ग्रामीणों को भूमि छोडऩे का नोटिस थमा दिया गया है।

पीढिय़ों का संघर्ष और अधूरी उम्मीदें 

पीडि़त ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से यहाँ रहकर खेती-किसानी के जरिए अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं। इनमें से किसी भी परिवार के पास 50 डिसमिल से अधिक भूमि नहीं है। इसी छोटी सी खेती में वे सब्जी और थोड़ा-बहुत अनाज उगाकर अपना जीवन यापन करते हैं। विडंबना यह है कि शासकीय भूमि पर काबिज होने के कारण इन परिवारों को आज तक प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल सका है। जैसे-तैसे कच्चे मकानों और झोपडिय़ों में गुजर-बसर कर रहे इन लोगों पर अब प्रशासन की गाज गिर गई है।

उपजाऊ भूमि को छोड़ बर्रा या बंजर भूमि का करें चयन 

ग्रामीणों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस भूमि का चयन सरकारी निर्माण के लिए किया गया है, वह पूरी तरह उपजाऊ और सिंचित है। यह भूमि वर्तमान में 100 से अधिक परिवारों की आजीविका का एकमात्र सहारा है। ग्रामीणों का तर्क है कि यदि प्रशासन चाहे तो क्षेत्र की किसी भी अन्य बर्रा या पड़त (बंजर) भूमि का चयन सरकारी निर्माण के लिए कर सकता है। इससे शासन का कार्य भी संपन्न हो जाएगा और गरीब परिवारों का आशियाना उजडऩे से भी बच जाएगा।

प्रशासन से न्याय की मांग

नोटिस मिलने के बाद से ग्रामीणों में गहरा आक्रोश और चिंता है। प्रभावित परिवारों ने जिला प्रशासन से मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि उन्हें इस भूमि से बेदखल किया गया, तो उनके पास न तो रहने के लिए छत बचेगी और न ही पेट पालने के लिए कोई साधन। अब देखना होगा कि प्रशासन इन भूमिहीन और छोटे किसानों की पुकार सुनकर क्या बीच का रास्ता निकालता है, जिससे विकास के साथ-साथ मानवता की रक्षा भी हो सके।

इनका कहना है

हमारे पूर्वजों और ससुर ने करीब 100 सालों तक इस जमीन पर खेती की है। अब यहां खेल का मैदान बनाने के लिए नोटिस आया है। पटवारी पिछले कुछ महीनों से जमीन की नपाई कर रहा है। वह कह रहा है कि यहाँ केवल गेहूं बोया गया है, जबकि हमने यहाँ सब्जियां भी लगाई हैं। पिछले 15 सालों से हमें यहाँ से हटने की धमकियां मिल रही हैं। हम कहाँ जाएं? यहाँ 100 से ज्यादा परिवार इस खेती पर निर्भर हैं। कई लोगों के पास रहने के लिए अपना घर तक नहीं है। अगर यह जमीन हमसे छीन ली गई, तो हमारे पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।


ग्रामीण, कौरगांव

कौरगांव ग्राम में शासकीय भूमि पर हमारे पूर्वजों के समय से, यानी हमारे जन्म से भी पहले से हमारा परिवार काबिज है। हम यहाँ फल-सब्जियाँ उगाकर अपना जीवन-यापन और भरण-पोषण करते रहे हैं। यहाँ 100 से अधिक परिवार इसी जमीन पर निर्भर हैं। अब हमें नोटिस मिला है कि यहाँ खेल का मैदान (ग्राउंड) बनाया जाएगा। यहां लगभग सभी लोगों को यह नोटिस मिला है। अगर यह जमीन हमसे छिन गई, तो हमारे पास बच्चों को ज़हर देने और खुद फांसी लगाने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। हमारी पूरी आजीविका इसी पर टिकी है।


ग्रामीण, कौरगांव

हम खेती किसानी वाले है, क्या करेंगे, अब यहीं से जीना मरना हमारे बाल-बच्चे सब इसी खेती से पल रहे हैं। इतनी बड़ी मिल बनी है, सरकार उसको हटा नहीं सकती और हमारी खेती-किसानी को छुड़ाने के लिए सरकार बोल रही है कि हटाओ और भागो यहाँ से, कहाँ जाएँगे हम लोग। इसमें तो हमारे बाल-बच्चे जिंदगी भर का खाना-कमाना, रोजगार हमारा इसी में चल रहा है और हमारी तीन पीढ़ी यहां खेती किसानी करके अपना पालन पोषण कर रही है। हमारे बुजूर्ग यहीं जन्मे और यही अंतिम सांस ली, अब हमसे यह खेती छीन ली गई तो हम परिवार को लेकर कहां जाएगे।


ग्रामीण, कौरगांव

जब से हमें होश है, हम इसी जगह पर रह रहे हैं। हमारे सास-ससुर और पति का देहांत भी यहीं हुआ। यह हमारी पुश्तैनी जगह है। अब अचानक हमसे यह आधार छीना जा रहा है। अगर हमें यहाँ से निकाला गया, तो हम और हमारे बच्चे कहाँ जाएंगे। प्रशासनिक अमला उनकी जमीन पर कब्जा करने आ रही है ताकि यहाँ खाली मैदान बनाया जा सके। ग्रामीणों का सवाल है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के वे इस उम्र में कहाँ पनाह लेंगे।


ग्रामीण, कौरगांव



 

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