सात समंदर पार से खिंचे चले आए नर्मदा भक्त

Advertisements

सात समंदर पार से खिंचे चले आए नर्मदा भक्त

तुर्की से मंडला पहुंचे आईटी इंजीनियर

  • बेटे संग शुरू की उत्तरवाहिनी परिक्रमा
  • आस्था के आगे फीकी पड़ी दूरियां
  • लीबिया और तुर्की में कार्यरत दिनेश फड़के ने पूरी की माँ नर्मदा की यात्रा
  • उत्तरवाहिनी मां नर्मदा परिक्रमा में बढ़ती जा रही आस्था
  • तुर्की से मंडला नर्मदा परिक्रमा करने पहुंचे नर्मदा भक्त

मंडला महावीर न्यूज 29. “जहाँ चाह, वहाँ राह” की कहावत को चरितार्थ करते हुए इन दिनों आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में माँ नर्मदा के प्रति अटूट आस्था का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। यहाँ के परिक्रमा पथ पर न केवल स्थानीय श्रद्धालु, बल्कि सात समंदर पार विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी माँ नर्मदा की भक्ति के वशीभूत होकर खिंचे चले आ रहे हैं। इसी कड़ी में तुर्की में कार्यरत वरिष्ठ आईटी प्रोजेक्ट मैनेजर दिनेश फड़के ने अपनी व्यस्त पेशेवर जिंदगी से समय निकालकर मंडला में माँ नर्मदा की उत्तरवाहिनी परिक्रमा का संकल्प लिया है।

तुर्की से मंडला तक का आध्यात्मिक सफर

मूलतः पुणे निवासी और वर्तमान में तुर्की (लीबिया) में आईटी क्षेत्र में कार्यरत दिनेश फड़के लंबी हवाई यात्रा तय कर शुक्रवार शाम को मंडला पहुंचे। उन्होंने स्थानीय व्यास नारायण मंदिर में रुद्राभिषेक और विधिवत संकल्प पूजा कर अपनी उत्तरवाहिनी परिक्रमा प्रारंभ की। इस बार वे अकेले नहीं हैं, बल्कि उनके साथ इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में पढ़ रहे उनके पुत्र वेदांग दिनेश फड़के, चाचा धनेश्वर अडसूल और चाची शोभा अडसूल भी इस पावन यात्रा के साक्षी बन रहे हैं।

पैदल और मोटरसाइकिल के बाद अब उत्तरवाहिनी परिक्रमा

दिनेश फड़के की माँ नर्मदा के प्रति दीवानगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे पिछले चार वर्षों से लगातार अलग-अलग स्वरूपों में परिक्रमा कर रहे हैं।

  • वर्ष 2021: दुबई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर रहते हुए उन्होंने 105 दिनों की कठिन पैदल परिक्रमा पूरी की।
  • वर्ष 2022: तुर्की स्थानांतरित होने के बाद भी उनका संकल्प नहीं डगमगाया और उन्होंने 50 दिनों में मोटरसाइकिल के जरिए माँ नर्मदा की पूरी परिक्रमा की।
  • वर्तमान: अब वे मंडला के विशेष भौगोलिक महत्व वाली उत्तरवाहिनी परिक्रमा को अपने परिवार के साथ पूर्ण कर रहे हैं।

मानवता और संवेदना का संगम

परिक्रमा के दौरान दिनेश फड़के का संवेदनशील चेहरा भी सामने आया। तट परिवर्तन के समय जब नन्हीं बच्चियों ने उनसे सहज भाव से स्कूल बैग की मांग की, तो उन्होंने तुरंत उनकी इच्छा पूरी करने का निर्णय लिया। उन्होंने स्थानीय सहयोगी लालाराम चक्रवर्ती के माध्यम से वापसी में कन्या भोजन के अवसर पर बच्चों को स्कूल बैग उपलब्ध कराने का वादा किया है।

विश्व की एकमात्र नदी जिसकी होती है परिक्रमा

माँ नर्मदा विश्व की इकलौती ऐसी नदी हैं, जिनकी परिक्रमा का विधान सदियों से चला आ रहा है। अमरकंटक से निकलकर खंभात की खाड़ी में मिलने तक माँ नर्मदा लगभग 1320 किमी की दूरी तय करती हैं, लेकिन परिक्रमा पथ के घुमावदार रास्तों के कारण भक्तों को करीब 3600 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। मंडला की भौगोलिक विशेषता यह है कि यहाँ नर्मदा जी शहर को तीन ओर से घेरती हैं, जिससे यहाँ का सौंदर्य और आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

‘नर्मदा माई’ ही करती हैं व्यवस्था

परिक्रमा पथ पर निकले भक्तों का अटूट विश्वास है कि उनकी भोजन और विश्राम की चिंता ‘माई’ स्वयं करती हैं। वर्षा ऋतु के चार महीनों को छोड़कर वर्ष भर यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। चाहे बुजुर्ग हों या युवा, सभी सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर नर्मदावासी बन जाते हैं। मार्ग में पड़ने वाले गाँवों और शहरों के रहवासी भी इन परिक्रमावासियों की सेवा को अपना सौभाग्य मानते हुए उनके रुकने और भोजन का प्रबंध स्वतः ही कर देते हैं।

समय के साथ परिक्रमा के स्वरूप में भी बदलाव आया है। आज के युग में जहाँ लोग चौपहिया वाहनों और मोटरसाइकिल से श्रद्धा प्रकट कर रहे हैं, वहीं 3 साल, 3 माह और 13 दिन की कठिन पैदल परिक्रमा करने वाले साधकों का जुनून भी कम नहीं हुआ है। दिनेश फड़के जैसे भक्तों की कहानी यह सिद्ध करती है कि माँ नर्मदा की पुकार सीमाओं और महाद्वीपों के बंधन को भी तोड़ देती है।



Leave a Comment