दुर्लभ बिल्ब पत्र- यहां मिलते है तीन से लेकर 21 पत्तियों वाले बेल पत्र

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दुर्लभ बिल्ब पत्र- यहां मिलते है तीन से लेकर 21 पत्तियों वाले बेल पत्र

  • हिरदेनगर की शिव वाटिका में है दुर्लभ बेल वृक्ष
  • इस बेल पत्र में होता है साक्षात शिव का वास

मंडला महावीर न्यूज 29. मंडला जिला औषधी पेड़, पौधों और प्राकृतिक सौंदर्यता के लिए विख्यात है। यहां के प्राकृति के अद्भूत नजारे को निहारने लोग दूर-दूर से आते है। माहिष्मती नगरी के नाम से प्रसिद्ध मंडला जिला अपनी गोद में अनेकों रहस्य छुपाए हुए है। जिसमें एक बेल पत्र का वृक्ष भी शामिल है। यह बेल पत्र दुर्लभ बेल पत्र के रूप में माना जाता है, जो मंडला जिला मुख्यालय से करीब 07 किमी दूर ग्राम हिरदेनगर के एक मालगुजार मिश्रा परिवार की भूमि में बनी शिव वाटिका में लगा हुआ है। जहां अनेकों रहस्य छुपे हुए है। यह दुर्लभ बेल पत्र औषधीय के साथ शापित भी है। इस बेल के पेड़ में 03 से लेकर 21 पत्तें होते है। बताया गया कि ग्राम हिरदेनगर की शिव वाटिका में करीब 150 वर्ष पुराना एक ऐसा ही पेड़ है। जिस समय अखिलेश मिश्रा के पूर्वजों ने इस बेल पत्र के पेड़ को लगाया था, करीब उसी समय इसी के नजदीक एक शिव मंदिर की भी स्थापना की गई थी। जहां भोलेनाथ विराजमान है। जिसकी पूजा अर्चना पूरे विधि विधान से आज भी की जाती है। इस शिव वाटिका की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस पेड़ के दर्शन करने और इसकी पत्तियों की चाह में शिव भक्त दूर-दूर से यहां आते हैं। वहीं इस पेड़ की सेवा करने वाला परिवार लोगों को इसका महत्व बताने के साथ इसका औषधीय गुण भी बताते है।

बताया गया कि ग्राम हिरदेनगर में वर्षो पूर्व मालगुजारी चला करती थी, उसी समय इस ग्राम के मालगुजार अखिलेश मिश्रा के पूर्वज शिव भक्त थे। इन्होंने सन् 1862 के करीब नेपाल से यह दुर्लभ बेल पत्र का पेड़ लाकर अपनी भूमि में लगाए। जिसकी देखभाल अखिलेश मिश्रा के पूर्वजों ने बच्चें की तरह की और वह दुर्लभ बेल पत्र का पेड़ संभल कर वृक्ष का रूप ले लिया। प्राय: बेल पत्र तीन पत्तियों के मिलते है, लेकिन आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला में नेपाल से लाकर लगाए गए इस बेल पत्र के वृक्ष में तीन नहीं, पांच नहीं, नौ नहीं इक्कीस पत्तियां होती है। मालगुजार के वंशज अखिलेश मिश्रा ने बताया कि इस बेल के पेड़ में ना फल होते है, ना ही फूल होते है।

आव्हान करके तोड़ी जाती है बेल पत्र 

अखिलेश मिश्रा ने बताया कि हमारी शिव वाटिका में लगे बेल के पेड़ में ना फल होता है, ना ही फूल होता है। यहां के लोग इस बेल पत्र के महत्व को नहीं समझते है, यह सावन माह में होता है। यदि इस तीन दल से अधिक दल वाले बेल पत्र को भगवान शिव को अर्पित करना है तो पहले इस बेल पत्र को तोडऩे के लिए इसका आव्हान किया जाता है। जिसके बाद एक नरियल बेल पत्र के पेड़ में चढ़ाया जाता है। इसके बाद आपको जितनी पत्ती तोडऩा है, उतनी पत्तियों की मांग इस पेड़ से की जाती है। इस दुर्लभ बेल पत्र के पेड़ में 03 से लेकर 33 पत्तियां तक होती है। लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी के चलते इसका सरक्षण होता जा रहा है। लोग इसके महत्व को नहीं समझते है, कभी भी किसी भी समय कितनी भी पत्तियां तोड़कर ले जाते है। जिसके कारण इस दुर्लभ बेल पत्र के पेड़ में पत्तियां कम होते जा रही है।

अती दुर्लभ हैं तीन से ज्यादा दलों वाले बेल पत्र

माना जाता है कि किसी को यदि तीन से ज्यादा दलों वाली बेल पत्र मिल जाए, तो उसे भगवान शंकर को चढ़ाने के बाद घर के मुख्य दरवाजे में फ्रेम करा कर रखने से पूजा स्थल पर रख कर प्रतिदिन पूजा करने से, रामायण या धार्मिक किताबों में दबा कर रखने से और तिजोरी या आलमारी, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में रखने से अलग-अलग तरह के फल प्राप्त होते हैं। ऐसे पेड़ भारत में लाखों में एक पाए जाते हैं। ये पेड़ ज्यादातर नेपाल में मिलते हैं।

इनका कहना है

बेल का पेड़ शिव का स्वरूप है, इसे श्री वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। माँ लक्ष्मी के रूपरूप में यह वृक्ष होता है। बेलपत्र से भोले नाथ प्रसन्न होते है, बेल वृक्ष की जो भक्त सेवा करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। तीन दलों से अधिक दलों वाले बेल पत्र दुलर्भ से ही मिलते है। सावन माह में बेल पत्र चढ़ाने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है।
पंडित विजयानंद शास्त्री, मंडला

तीन से अधिक दलों वाले बेल पत्र का महत्वपूर्ण महत्व है। यह भगवान शिव में चढ़ाया जाता है। जिसका अलग ही महत्व है। हिरदेनगर में लगे इस दुलर्भ बेल पत्र को दूर-दूर से लोग लेने आते है और भगवान शिव को अर्पित करते है। यहां तीन दलों से अधिक दलों वाले बेल पत्र है।
राकेश चौरसिया, ग्रामीण, हिरदेनगर



 

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